रचनाएं
सुखे-सुखे भवपार हो
तुलसी गुरु मुख कमल से, दीक्षा की स्वीकार
महाप्रज्ञ-महाश्रमण की करुणा अपरम्पार।।
अर्जुनलाल जी की सुता, विनयश्री जी नाम।
श्रीडूंगरगढ़ वासिनी, किया है अच्छा काम।।
सजग अवस्था में किया, संथारा स्वीकार।
सुखे-सुखे भवपार हो, अन्तर मन उद्गार।।
जगवत्सला, अतुलप्रभा, सहयोगी हर याम।
चढ़ते-बढ़ते ही रहे, अब सतिवर परिणाम।।
करते मंगल कामना, शीघ्र वरें भव थाह।
संत कमल श्रेयांस की, यही एक है चाह।।