जीवन में इच्छाओं का हो अल्पीकरण : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

ब्यावर। 03 जनवरी 2026

जीवन में इच्छाओं का हो अल्पीकरण : आचार्यश्री महाश्रमण

तीर्थंकर के प्रतिनिधि, अखण्ड परिव्राजक आचार्य श्री महाश्रमण जी लगभग 9 कि.मी. का विहार कर ब्यावर स्थित नानेश रत्नम भवन में पधारे। नानेश रत्नम भवन परिसर में समुपस्थित श्रद्धालुओं को अमृत देशना प्रदान करते हुए महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमण जी ने कहा कि मनुष्यों के भीतर कषाय और राग-द्वेष का भाव होता है। अवीतराग मनुष्यों में क्रोध, मान, माया और लोभ — ये चार कषाय विद्यमान होते हैं। इन चारों में लोभ कषाय ऐसा तत्त्व है, जिसका क्षय सबसे बाद में होता है। लोभ अनेक पापों का कारण बनता है और तृष्णा, इच्छा तथा भौतिक आकांक्षा लोभ के परिवार के सदस्य हैं। लोभी व्यक्ति को यदि सोने और चांदी के असंख्य पर्वत भी मिल जाएं, तो भी उस लोभी व्यक्ति की इच्छाएं और बढ़ती जाती हैं। कहा गया है कि इच्छा आकाश के समान अनन्त होती है। आकाश का कोई अन्त नहीं होता। आकाशास्तिकाय लोक और अलोक — दोनों में है। व्यक्ति इच्छाओं के कारण दुःखी भी बन जाता है। व्यक्ति की आकांक्षा के अनुरूप जब उसे नहीं मिलता है तो उसे दुःख हो सकता है, गुस्सा भी आ सकता है। इसलिए व्यक्ति को इच्छाओं के अल्पीकरण का प्रयास करना चाहिए। जिस व्यक्ति की सारी इच्छाएं समाप्त हो जाएं, वह अनिच्छ हो जाता है। बहुत ज्यादा इच्छाएं हों तो वह महेच्छ कहलाता है और इच्छाओं का अल्पीकरण हो जाए तो व्यक्ति अल्पेच्छ बन जाता है। गृहस्थ जीवन में अनिच्छ हो जाना तो कठिन है, परन्तु अल्पेच्छ बनने का प्रयास करना चाहिए। व्यक्ति को अपनी इच्छाओं का अल्पीकरण करने का निरन्तर प्रयास करना चाहिए।
जैन साधना पद्धति में श्रावक के बारह व्रतों में पांचवां व्रत है — इच्छा-परिमाण व्रत, अर्थात् इच्छाओं का परिमाण करना। सातवां व्रत उपभोग-परिभोग परिमाण व्रत है, जिसमें व्यक्तिगत जीवन में उपयोग-परिभोग की वस्तुओं का सीमाकरण किया जा सकता है। व्यक्ति की लालसा अवांछनीय रूप से अधिक नहीं होनी चाहिए। व्यक्ति यह विचार करे कि मेरी आवश्यकता कितनी है और इच्छाएं कितनी हैं। यदि वर्ष भर में तीन-चार ड्रेस से काम चल सकता है तो अनावश्यक रूप से 15–20 ड्रेस क्यों खरीदी जाएं। व्यक्ति को जीवन में खान-पान, रहन-सहन, वस्त्र आदि के उपयोग में संयम रखना चाहिए। वाणी का भी संयम रखना चाहिए। अनावश्यक नहीं बोलना चाहिए। जहां अपेक्षित हो, वहां वाणी का विवेकपूर्ण उपयोग करना चाहिए। यत्नपूर्वक बोलना भी एक प्रकार का तप हो जाता है। अतः जीवन में इच्छाओं का, इन्द्रियों का, मन, वाणी और शरीर का संयम रखने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्य प्रवर ने कहा कि परम पूज्य आचार्य श्री तुलसी और परम पूज्य आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी के साथ पूर्व में ब्यावर आना हुआ था। उसके बाद लगभग 16–17 वर्षों में पहली बार पुनः आना हुआ है। ब्यावर की समस्त जनता में अहिंसा, त्याग और तप आदि की भावना बनी रहे, इनकी आराधना करने का प्रयास हो और जनता में शांति बनी रहे। आचार्य श्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुतविभा जी ने ब्यावर की जनता को उद्बोधन प्रदान करते हुए कहा कि आचार्य प्रवर ने आचार्य बनने के पश्चात् प्रलंब यात्राएं की हैं और तेईस राज्यों का स्पर्श कर लिया है। नेपाल में चातुर्मास किया और भूटान की भी यात्रा की है। इन यात्राओं में जैन एकता का भी सुंदर दृश्य देखने को मिला। आचार्यवर जहां पधारते हैं, वहां धर्म का उपदेश देते हैं और धर्म ही ऐसा तत्त्व है जो द्वेष को समाप्त कर हमें वीतरागता की ओर ले जा सकता है।
आचार्य श्री के स्वागत में मुमुक्षु रिचा सांखला ने अपनी अभिव्यक्ति दी। ब्यावर ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने अपनी प्रस्तुति दी और पूज्य प्रवर ने उन्हें मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। स्थानीय तेरापंथ सभा की ओर से रमेश श्रीश्रीमाल ने अभिव्यक्ति दी। तेरापंथ महिला मंडल, ब्यावर ने गीत का संगान किया। गौतम गोखरू, प्रवास स्थल भवन की ओर से गौतम चौधरी, तेयुप ब्यावर के अध्यक्ष मुकेश रांका तथा चन्द्रकांता रांका ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेशकुमार जी ने किया।