गुरुवाणी/ केन्द्र
राग और द्वेष हैं कर्म के बीज : आचार्यश्री महाश्रमण
महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण जी अपनी धवल सेना के साथ चण्डावल से लगभग पन्द्रह किमी. का प्रलम्ब विहार कर ब्यावर जिले के झूंठा गांव में स्थित श्री चिंतामणि पार्श्वनाथ मंदिर परिसर में पधारे। मंदिर परिसर में आयोजित मंगल प्रवचन कार्यक्रम में समुपस्थित श्रद्धालुओं को अमृत देशना प्रदान करते हुए युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने फरमाया कि राग और द्वेष कर्म के बीज होते हैं। पाप कर्म के लगने में राग-द्वेष की बड़ी भूमिका होती है। वीतराग पुरुष तो राग-द्वेष से उपरत हो जाते हैं, सामान्य प्राणी राग-द्वेष से युक्त होता है। वह कभी राग के कारण अपराध कर लेता है तो कभी द्वेष के कारण दोष-सेवन व अपराध का कार्य कर लेता है।
सन् 2025 की संपन्नता निकट आ रही है। वर्ष आता है, शुरू होता है और एक दिन संपन्न हो जाता है। एक-एक वर्ष जा रहा है, अतः व्यक्ति यह सोचे कि मैं राग-द्वेष में ज्यादा प्रवृत्ति न करूं, राग-द्वेष से बचने का प्रयास करूं। धार्मिकता का जीवन जीने का अभ्यास करूं। धर्म की दृष्टि से वर्धमान रहूं। व्यक्ति अपने जीवन में धन की कमाई कितनी भी कर ले, लेकिन वह आगे साथ जाने वाली नहीं होती। व्यक्ति के साथ आगे के भव में उसके द्वारा किया हुआ धर्म ही जाने वाला होता है। इसलिए व्यक्ति को धार्मिक बनने का प्रयास करना चाहिए। बीते वर्ष में मैंने क्या किया, यह चिंतन करें और कोई कमी रह गई है तो अगले वर्ष और अधिक जागरूक रहने का संकल्प करें कि मेरी धर्म-साधना अच्छी चलती रहे।
श्रावक यह प्रयास करे कि प्रतिदिन एक सामायिक हो जाए, महीने में एक-दो उपवास भी हो जाएं, साथ ही स्वाध्याय, ध्यान तथा दूसरों की आध्यात्मिक सेवा हो सके। जिस तरह व्यक्ति पैसों का हिसाब-किताब करता है, उसी तरह व्यक्ति को धर्म का भी हिसाब-किताब करना चाहिए कि इस वर्ष में कोई बड़ा पाप तो नहीं किया। यदि बड़ा पाप हो भी गया हो तो प्रायश्चित के द्वारा शुद्धिकरण करने का प्रयास करना चाहिए। पापों से बचने के लिए व्यक्ति को राग-द्वेष रूपी कर्म के बीजों से बचने का प्रयास करना चाहिए। शरीर नश्वर है, आत्मा अमर है, इसलिए व्यक्ति को अपनी आत्मा के कल्याण का प्रयास करना चाहिए। आगामी वर्ष में जितना संभव हो सके, धर्म और ध्यान करने का प्रयास करें — यह काम्य है।