गुरुवाणी/ केन्द्र
प्रतिकूल परिस्थिति को सहन करने का हो प्रयास : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, शांति-दूत आचार्य श्री महाश्रमण जी अपनी धवल सेना के साथ लगभग 10 कि.मी. का विहार कर सेन्दड़ा गांव स्थित राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में पधारे। युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने आर्हत् वाणी के माध्यम से अमृत देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि व्यक्ति के जीवन में सहन-शक्ति का बहुत महत्त्व है। मनुष्य में शारीरिक और मानसिक — दोनों प्रकार के दुःख होते हैं: जरा और शोक। शारीरिक दुःख जरा के अन्तर्गत और मानसिक दुःख शोक के अन्तर्गत लिए जा सकते हैं। शारीरिक कठिनाई आए तो व्यक्ति उसे यथासंभव सहन करे और मानसिक प्रतिकूल स्थिति आ जाए तो उसमें भी सहिष्णुता और क्षमाशीलता रखे।
व्यक्ति को कभी ठंड लगे, कभी गर्मी लगे, कहीं थोड़ा दर्द हो तो मौसमजन्य कठिनाइयों की ज्यादा चिंता नहीं करनी चाहिए। सावधानी रखी जा सकती है, बचाव किया जा सकता है। शरीर में भी कभी कठिनाई हो सकती है — यह शरीर की बीमारी के रूप में हो सकती है। इन पर विशेष ध्यान दिया जा सकता है कि बीमारी न रहे। शरीर के सभी अवयव स्वस्थ रहें — यह ध्यातव्य है। इन सब कठिनाइयों को सहन करना चाहिए। सहन करने में मनोबल का बड़ा महत्त्व है। व्यक्ति में उत्साह, साहस और मनोबल हो तो वह छोटी-मोटी कठिनाइयों की परवाह किए बिना आगे चलता रहता है। कभी भूख लग आती है, कभी प्यास लग सकती है। सोने का स्थान ऊबड़-खाबड़ मिल सकता है। इन सभी कठिनाइयों को साधु को समभाव, सहिष्णुता और मनोबल से सहन करना चाहिए। मनोबल होता है तो व्यक्ति छोटी-बड़ी कठिनाइयों को सहन कर लेता है। मनोबल के अभाव में पग-पग पर कठिनाइयाँ आ सकती हैं।
परिवार अथवा समाज में भी गुस्से और आवेश से बचना चाहिए। जितना संभव हो सके, सहन करने का प्रयास हो। साधु में विनय और सहिष्णुता हो। साधु ही नहीं, आचार्य में भी विनय होना चाहिए। सभी का व्यवहार प्रोटोकॉल के अनुरूप होना चाहिए। चतुर्दशी के संदर्भ में आचार्य प्रवर ने हाजरी के क्रम को संपादित किया। मुनि मेघ कुमार जी और मुनि मर्यादा कुमार जी ने लेख-पत्र का वाचन किया। तदुपरान्त सभी चारित्रात्माओं ने लेख-पत्र का उच्चारण किया। विद्यालय के प्रिंसिपल भीखमचंद परिहार ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेशकुमार जी ने किया।