स्वाध्याय
धर्म है उत्कृष्ट मंगल
इस प्रकार जयाचार्य ने और भी कई नई व्यवस्थाओं का सूत्रपात किया।
आचार्यश्री तुलसी ने संघीय गतिविधियों को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए व्यवस्थासंबंधी कुछ नए प्रयोग किए।
निकाय व्यवस्या, नए पद
आचार्य भिक्षु द्वारा विहित एक नेतृत्व की व्यवस्था तेरापंथ की मौलिक मर्यादा है। उनमें परिवर्तन की कल्पना कभी नहीं की गई, फिर भी संघ विस्तार और कार्य-विस्तार को देखते हुए एक सहयोगी व्यवस्था का निर्माण किया गया। कार्य को कई भागों में बांटा गया, जैसे -प्रबन्ध, साधना, शिक्षा, साहित्य और सेवा आदि। इन कार्यों को कुछ साधु-साध्वियों को अलग-अलग सौंपा गया। जिन साधु-साध्वियों को ये कार्य सौपे गए, वे निकाय व्यवस्थापक कहलाए।
इन सबके ऊपर वि. सं. २०२२ में 'निकाय सचिव' और वि. सं. २०३८ में 'निकाय व्यवस्थाप्रमुख' की नियुक्ति की गई। वर्तमान में यह व्यवस्था अप्रभावी है। पूज्यश्री ने वि, सं. २०४६ में महाश्रमण व महाश्रमणी के रूप में दो नए पदों का सृजन किया।
गोचरी की स्वतंत्र व्यवस्था
आचार्यश्री तुलसी के समय तक यह परंपरा थी कि भिक्षा में जो वस्तुएं आती, वे दो भागों में विभक्त हो जातीं! उनमें जो समुच्चय की होतीं, वे विभाग-स्थल में रख दी जातीं और जो निजी (बाजरे की रोटियां आदि) होतीं, उन्हें भिक्षा लाने वाले साधु आचार्य को दिखाकर अपने आहार-स्थल पर ले जाते। समुच्चय की वस्तुओं का सब साधु-साध्वियों में विभाजन होता। उसमें बहुत समय खर्च होता। आचार्यश्री तुलसी ने इस व्यवस्था को बदला और स्वतन्त्र गोचरी की व्यवस्था की जिसके अनुसार अपने-अपने ग्रुप में जितना आहार अपेक्षित होता है उतना आहार गोचरी करने वाले साधु ले आते हैं। सब में उसका विभाजन नहीं किया जाता है। इससे समय और श्रम की बचत होने लगी है।
मुनिचर्या में परिवर्तन
जयाचार्य से पहले आचार्य के वस्त्रों का प्रक्षालन विहित नहीं था। उन्होंने इसमें परिवर्तन किया और आचार्य के वस्त्र-प्रक्षालन को विहित ठहराया।
आचार्यश्री तुलसी ने इसी परिवर्तन को और अधिक विकसित करते हुए निर्णय किया-साधु-साध्वियों के वस्त्र भी निशचत अवधि के अन्तराल से धोये जा सकते हैं। इसी तरह सायंकालीन गोचरी, ध्वनिवर्धक यन्त्र का यथाविधि प्रयोग आदि कुछ मुनिचर्या संबंधी परिवर्तन आचार्यश्री तुलसी द्वारा किए गए।
एकाधिक पूर्वाचार्यो का जीवन-वृत्त लेखन
श्रीमद्जयाचार्य ने 'भिक्खु जस-रसायन' तथा 'ऋषिराय चरित्र' के माध्यम से क्रमशः आचार्य भिक्षु एवं आचार्य श्री रायचन्द के जीवन-चरित्र लिखे।
आचार्यश्री तुलसी ने 'माणकमहिमा', 'डालिम चरित्र' तथा 'कालूयशोविलास' के माध्यम से क्रमशः माणकगणी, डालगणी तथा कालूगणी के जीवन-चरित्र लिखे। उल्लेखनीय है कि एकाधिक पूर्वाचार्यों की जीवनियां लिखने वाले तेरापंथ के ये दो ही आचार्य हुए हैं।
ज्येष्ठ भ्राता की दीक्षा
श्रीमद्जयाचार्य के ज्येष्ठ भ्राता श्री स्वरूपचंदजी तथा भीमराजजी ने तेरापंथ की मुनि-दीक्षा स्वीकार की।
आचार्य श्री तुलसी के ज्येष्ठ भ्राता श्री चंपालालजी ने भी तेरापंथ संघ में मुनि दीक्षा स्वीकार की। ऐसा योग तेरापंथ के और किसी आचार्य को नहीं मिला।
एकाधिक साध्वी-प्रमुखाओं की नियुक्ति
श्रीमज्जयाचार्य ने अपने आचार्य-काल में दो साध्वीप्रमुखाओं को नियुक्तियां कीं-
१. साध्वी-प्रमुखाश्री सरदारांजी, वि. सं. १९१०
२. साध्वी-प्रमुखाश्री गुलाबांजी, वि. सं. १९२७