स्वाध्याय
श्रमण महावीर
'एकांगी दृष्टि से देखते हो तो है, अनेकांत दृष्टि से देखो तो नहीं है।'
'यह कैसे?'
'मैं साधना-काल में बाहर में अकेला था और भीतर में भरा हुआ। संस्कारों की पूरी परिषद् मेरे साथ थी। अब बाहर से मैं परिषद् के बीच हूं और भीतर में अकेला, संस्कारों से पूर्ण शून्य।'
आजीवक संघ के आचार्य गोशालक ने भी भगवान् के जीवन को विरोधाभासों से परिपूर्ण निरूपित किया। मुनि आर्द्रकुमार वंसतपुर से प्रस्थान कर भगवान के पास जा रहे थे। उन दिनों भगवान् राजगृह के गुणशीलक चैत्य में निवास कर रहे थे। बीच में आर्द्रकुमार की गोशालक से भेंट हो गई। गोशालक ने परिचय प्राप्त कर कहा-
'आर्द्रकुमार ! तुम महावीर के पास जा रहे हो, यह आश्चर्य है। तुम्हारे जैसा समझदार राजकुमार कैसे बहक गया?'
'मैं बहका नहीं हूं। मैंने महावीर को जाना है, समझा है।'
'मैं उन्हें तुमसे पहले से जानता हूं, वर्षों तक उनके साथ रहा हूं।'
'महावीर के बारे में आपका क्या विचार है?'
'मेरा विचार तुम इस बात से समझ लो कि अब मैं उनके साथ नहीं हूं।'
'साथ नहीं रहने के अनेक कारण हो सकते हैं। मैं जानना चाहता हूं कि आपने किस कारण से उनका साथ छोड़ा?'
'महावीर अस्थिर विचार वाले हैं। वे कभी कुछ कहते हैं और कभी कुछ। एक बिन्दु पर स्थिर नहीं रहते-
lपहले वे अकेले रहते थे, अब परिषद् से घिरे हुए रहते हैं।
lपहले वे मौन रहते थे, अब उपदेश देने की धुन में लगे हुए हैं।
lपहले वे शिष्य नहीं बनाते थे, अब शिष्यों की भरमार है।
lपहले वे तपस्या करते थे, अब प्रतिदिन भोजन करते हैं।
lपहले वे रूखा-सूखा भोजन करते थे, अब सरस भोजन करते हैं।
तुम्हारे महावीर का जीवन विरोधाभासों से भरा पड़ा है। इसीलिए मैंने उनका साथ छोड़ दिया।'
गोशालक ने फिर अपने वक्तव्य की पुष्टि करने का प्रयत्न किया। वे बोले- 'आर्द्रकुमार! तुम्हीं बताओ, उनके अतीत और वर्तमान के आचरण में संगति कहां है? संधान कहां है? उनका अतीत का आचरण यदि सत्य था तो वर्तमान का आचरण असत्य है और यदि वर्तमान का आचरण सत्य है तो अतीत का आचरण असत्य था। दोनों में से एक अवश्य ही त्रुटिपूर्ण है। दोनों सही नहीं हो सकते।'
'मेरी दृष्टि में दोनों सही हैं।'
'यह कैसे?'
'मैं सही कह रहा हूं, आजीवक प्रवर! भगवान् पहले भी अकेले थे, आज भी अकेले हैं, और अनागत में भी अकेले होंगे। भगवान् जब भीतर की यात्रा कर रहे थे, तब बाहर में अकेले थे। उनकी वह यात्रा पूर्ण हो चुकी है। अब वे बाहर की यात्रा कर रहे हैं इसलिए भीतर में अकेले हैं। आचार्य! आप जानते ही हैं कि खाली मनुष्य एकान्त में जाता है और भरा मनुष्य भीड़ में बांटने आता है। ये दोनों भिन्न परिस्थितियों के भिन्न परिणाम हैं। इनमें कोई विसंगति नहीं है।'
'भगवान् सत्य के साक्षात्कार की साधना कर रहे थे, तब उनकी वाणी मौन थी। उन्हें सत्य का साक्षात् हो चुका है। अब सत्य उनकी वाणी में आकार ले रहा है।'
भगवान् साधना-काल में अपूर्णता से पूर्णता की ओर प्रयाण कर रहे थे। उस समय कोई उनका शिष्य कैसे बनता ? अब वे पूर्णता में उपस्थित हैं। अपूर्ण पूर्ण का अनुगमन करता है, इसमें अनुचित क्या है?