स्वाध्याय
संबोधि
(२) ऊनोदरी
इसका अर्थ है उदर को पूर्ण नहीं भरना। जैसे उपवास में कठिनाई है वैसे अति-भोजन में भी है। भोजन के अभाव में ध्यान पेट की तरफ रहता है, वैसे अति-भोजन कर लेने पर भी चेतना ऊर्जा को विश्रान्ति नहीं मिलती। अब वह भरे हुए पेट के आस-पास पहुंचने में व्यस्त रहने लगती है। उपवास के पूर्व 'कल उपवास करना है', इसलिए आज अच्छी तरह खा लो-यह भी स्वस्थ चिंतन नहीं है। यह साधना के लिए अनुकूल नहीं है। साधक यहां पदच्युत हो जाता है। अधिक खा लेने का अर्थ होगा-जब तक भोजन का सात्मीकरण नहीं होगा तब तक ध्यान का प्रवाह चेतना की तरफ प्रवाहित कैसे होगा ? अति भोजन और बिलकुल कष्ट पूर्ण निराहार-दोनों ही स्थितियों में आत्मा का स्वास्थ्य नष्ट होता है।
''अइमायं न भुंजेज्जा'। 'मायण्णे एसणारए'– जैसे आगम सूक्त अनेक स्थलों पर साधक को सचेत करते हैं कि अतिमात्रा में भोजन न करे। वह आहार की मात्रा का जानकार हो।
ऊनोदरी के लिए आचार्य भिक्षु ने लिखा है– 'ऊनोदरी ए तप करवों दोहिलो वैराग्य बिना होवे नहीं'– ऊनोदरी तप करना कठिन है। उसके लिए वैराग्य-विरक्ति चाहिए। भोजन करने के लिए बैठकर अपने पेट को थोड़ा-सा खाली रखना, पूर्ण से पहले ही अपने को संकुचित कर लेना, सरल नहीं है। अधिक खाने की बात प्रायः सुनी जाती है, किन्तु आज भूख से कुछ कम खाया है-ऐसा शायद ही कभी सुनने को मिलता हो। उपवास सरल हो जाता है, किन्तु ऊनोदरी कठिन। सम्राट् प्रसेनजित् का प्रसंग है-
भगवान् बुद्ध राजगृही में आये। नगरवासी दर्शन और श्रवण के लिए बुद्ध के चरणों में पहुंचे। सम्राट् प्रसेनजित् भी आया। आगे की पंक्ति में बैठा। सम्राट् अतिभोजी था। थोड़ी देर में जंभाइयां लेने लगा, ऊंघने लगा। लोगों को भी बुरा लगा। बुद्ध ने कहा-'राजन् ! क्यों जीवन व्यर्थ गंवा रहे हो? क्या जीवन खाने के लिए ही है?' सम्राट् ने सकुचाते हुए कहा- 'भंते ! आप ठीक कहते हैं! यह भोजन का ही परिणाम है। बड़ी बुरी आदत है। बुद्ध ने सुदर्शन नामक प्रिय अनुचर से कहा- 'सम्राट् जब भोजन करे तब यह गाथा सुनाया करो। यदि राजा मना भी करे तो मानना मत। सुदर्शन ने कहा-अच्छा।
'मनुजस्स सदा सतीमतो, मत्तं जानतो लब्द्ध भोजने।
तनु तस्स भवन्ति वेदना, सणिकं जीरति आयुपालयं॥'
'स्मृतिमान् व्यक्ति को प्राप्त भोजन में मात्रज्ञ होना चाहिए। जो मात्रज्ञः होता है उसकी वेदना नष्ट हो जाती है और वह पुष्ट शरीर वाला होता है। इसके विपरीत जो अतिभोजी होता है, वह अल्पायु, शीघ्र बूढ़ा और रोगी होता है।'