तेरापंथ-मेरा पंथ कार्यशाला का आयोजन

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गंगाशहर।

तेरापंथ-मेरा पंथ कार्यशाला का आयोजन

आचार्य श्री भिक्षु जन्म त्रि शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में तेरापंथ- मेरा पंथ कार्यशाला का आयोजन तेरापंथी सभा गंगाशहर द्वारा आशीर्वाद भवन में उग्र विहारी तपोमूर्ति मुनि कमल कुमार जी स्वामी के सान्निध्य में किया गया। कार्यक्रम में उग्र विहारी तपोमूर्ति मुनि कमल कुमार जी स्वामी ने उद्बोधन देते हुए कहा कि आचार्य भिक्षु ने भगवान महावीर स्वामी की वाणी का गहन अध्ययन किया। फिर भगवान महावीर की वाणी को सरल शब्दों में व्याख्या की ओर जनता को प्रतिबोद्ध दिया। आगम -सम्मत शुद्ध साध्वाचार की अनुपालना करने के लिए उन्होंने एक नए पंथ का प्रवर्तन किया। तेरापंथ के साधु पांच महाव्रत, पांच समिति ओर तीन गुप्ति के तेरह नियमों का पालन करने का प्रण लेकर चलते हैं।
उन्होंने ज्ञान, दर्शन, चारित्र ओर तप से अभिमंडित एक अनुशासित धर्मसंघ की नींव रखी। उन्होंने कहा कि तेरापंथ धर्म संघ के प्रथम आचार्य श्री भिक्षु दृष्टा थे। साधना के साधन के सम्यक स्वरूप का निर्धारण कर चारित्र के क्षेत्र में शिखरों पर विजय पाने के अभियानों का मार्गदर्शन किया। एक संगठित सुव्यवस्थित और सुदृढ श्रमण संघ को तेरापंथ के रूप में मूर्तरूप दिया। धर्मसंघ की चिरजीविता के लिए अनेक मर्यादाओं का निर्माण किया। संघ की वृहता और एकरूपता के लिए व्यक्तिगत शिष्य प्रथा को समाप्त किया और सबके लिए एक ही आचार्य का होना मान्य रखा। इस प्रकार एक आचार्य, एक विचार और एक समाचारी के लिए के लिए तेरापंथ को उन्होंने अन्य सभी धर्मसंघों के लिए अनुकरणीय बना दिया। कार्यशाला में मुख्य प्रशिक्षक उपासक श्रेणी के राष्ट्रीय संयोजक सूर्यप्रकाश सामसुखा ने अपने विचार रखते हुए
कहा कि हमारे पूर्वजों ने बहुत सोच समझ कर तत्व की गहराई को समझ कर तेरापंथ धर्मसंघ ग्रहण किया। आचार्य भिक्षु ने धर्म की व्याख्या की - त्याग धर्म है ,भोग अधर्म है। व्रत धर्म है, अवर्त अधर्म है। संयम धर्म है, असंयम अधर्म है। अहिंसा धर्म है, हिंसा अधर्म है। जीने की आकांक्षा करना राग है। मरने की कामना करना द्वेष है। मोक्ष की कामना करना धर्म है। उन्होंने तेरापंथ की मान्यताओं का गहराई से विवेचन करते हुए कहा कि धर्म अनमोल है। धर्म केवल मात्र आत्मा को पाप से बचाने की प्रवृत्ति है। असंयति प्राणी के जीने की इच्छा करना राग है। असंयति प्राणी के मरने की कामना करना द्वेष है। उपासक श्रेणी के राष्ट्रीय संयोजक श्री सूर्यप्रकाश सामसुखा ने दान , दया , धर्म, पूजा की बहुत ही बारीकी से विवेचन किया तथा स्पष्टत रूप से खा की जहाँ व जिस कार्य में हिंसा हो वहां धर्म नहीं हो सकता। प्रतिभागियों द्वारा अनेक प्रशन पूछे गए जिनका उतर सामसुखा ने शालीनता से देकर गुरु आस्था का परिचय दिया। कार्यशाला में 400 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया। स्वागत भाषण सभा के अध्यक्ष नवरतन बोथरा ने किया। आभार ज्ञापन सभा के सहमंत्री पीयूष लूणिया ने किया। कार्यक्रम का संचालन सभा के मंत्री जतनलाल संचेती ने किया।