करणीय और अकरणीय कार्यों का विवेक व्यक्ति में रहे : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

रूपनगढ़। 11 जनवरी 2026

करणीय और अकरणीय कार्यों का विवेक व्यक्ति में रहे : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अपनी धवल सेना के साथ प्रातःकाला की कड़कड़ाती सर्दी में ग्राम रलावता से मंगल प्रस्थान किया और लगभग 13 किमी का विहार सुसंपन्न कर रूपनगढ़ स्थित स्वामी विवेकानन्द महाविद्यालय में पधारे। महाविद्यालय परिसर में आयोजित मंगल प्रवचन कार्यक्रम में पावन पाथेय प्रदान करते हुए युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने फरमाया कि इस संसार में जन्म मरण की परंपरा चलती है। प्राणी जन्म लेता है, जीवन जीता है, और एक दिन अवसान को प्राप्त हो जाता है। इस जन्म मरण वाले संसार में कोई नरक गति, तिर्यंच गति, निगोद, आदि दुर्गतियों में जाता है, इन दुर्गतियों में जाना न हो ऐसा व्यक्ति को प्रयास करना चाहिए और आखिर में मोक्ष भी प्राप्त हो सके। जीवन का परम लक्ष्य यही होना चाहिए कि मोक्ष की प्राप्ति हो जाए। पूर्व कर्मों का क्षय हो जाए और पूर्णतया कर्म मुक्ति की अवस्था प्राप्त हो जाए। 
संसारी जीवों का जीवन नश्वर होता है और एक दिन समाप्त होने वाला होता है। इन प्राणियों में मनुष्य का जीवन मिलना विशेष बात होती है। पांच इन्द्रियों व मन वाला जीवन है और यह ऐसा जीवन है जहां से साधना करके मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए व्यक्ति को करणीय और अकरणीय कार्यों का विवेक होना चाहिए। इस जन्म में धन, मकान, आदि की अनुकूलताएं पूर्वार्जित पुण्य से प्राप्त हुई हैं परन्तु यह खजाना तो एक दिन खाली हो जाएगा। अतः व्यक्ति यह चिंतन करे कि मैं आगे के लिए क्या कर रहा हूं? मैं धर्म का जीवन जी रहा हूं या नहीं, जीवन में संयम, अहिंसा, ईमानदारी, नैतिकता है या नहीं? यदि जीवन अच्छा है पवित्र है और साथ में संयम और तप भी है तो आशा करनी चाहिए कि आगे भी अच्छी स्थिति प्राप्त हो सकेगी। व्यक्ति को झूठ-कपट और चोरी से बचना चाहिए और जीवन में ईमानदारी रखनी चाहिए। अतः यदि हमारे जीवन में त्याग, तपस्या साधना आदि रहेगी तो हमारा वर्तमान जीवन भी अच्छा रहेगा तथा आगे का जीवन भी अच्छा रह सकेगा। रूपनगढ़ की ओर से संजय जैन, स्वामी विवेकानन्द महाविद्यालय के डायरेक्टर बी. एल. देवानंदा तथा प्रिंसीपल राजू वासानी ने आचार्यप्रवर के स्वागत में अपनी अभिव्यक्ति दी। आचार्य प्रवर ने मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।