गुरुवाणी/ केन्द्र
कर्म कर्ता का ही अनुगमन करता है : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, तीर्थंकर के प्रतिनिधि, अखण्ड परिव्राजक, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी आज प्रातःकाल रूपनगढ़ गांव, जिला अजमेर से गतिमान हुए और अपनी धवल सेना के साथ डीडवाना-कुचामन जिले के परबतसर गांव स्थित सीमा मेमोरियल शिक्षण संस्थान में लगभग 11 किमी का विहार कर पधारे। शिक्षण संस्थान में आयोजित मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में समुपस्थित श्रद्धालुओं को आर्हत् वाग्मय के माध्यम से पावन संबोध प्रदान करते हुए महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने फरमाया कि हमारी दुनिया में दो तत्त्व हैं - चेतन और अचेतन। हमारे जीवन में भी दो तत्त्व हैं - आत्मा और शरीर। आत्मा अपने आप में ज्ञानमय और चैतन्यमय है, परन्तु शरीर अपने आप में अचेतन है। आत्मा शाश्वत है तो शरीर अशाश्वत है। आत्मा अच्छेद्य है, अभेद्य है, अदाह्य है। आत्मा पुनर्जन्म भी लेत है और यह क्रम तब तक चलता रहता है जब तक आत्मा मोक्ष को प्राप्त न हो जाए। कई आत्माएं ऐसी भी हैं जो कभी भी मोक्ष को प्राप्त नहीं होगी। कई आत्माएं निर्मल व विशुद्ध बनकर परमात्म स्थान को प्राप्त कर लेती है।
वर्तमान में हम जो मनुष्य रूप में आत्माएं हैं, उनके कर्म लगे होने के कारण शुद्ध आत्माएं नहीं है और जन्म-मरण का क्रम भी चल रहा है। आत्मा अकेली कर्म का बंध करती है और अकेली ही कर्मों का फल भोगती है। व्यक्ति को पाप के कारण दुःख मिलते हैं और पुण्य के कारण भौतिक सुखों की प्राप्ति भी हो सकती है। जब व्यक्ति के पाप कर्म उदय में आते हैं तो खुद का दुःख, खुद को ही भोगना होता है। कोई भी उस कष्ट को बंटा नहीं सकता। जो कर्म किए हैं, वे अपने कर्ता का अनुगमन करते हैं, कर्म करने वाले को ही कर्म अपना फल देते हैं। इसलिए आत्मा अकेली है, अकेला जन्म लेता है, अकेला मृत्यु को प्राप्त होता है, अकेला कर्मों का बंध करता है, और खुद को ही कर्म भोगने पड़ते हैं। इसलिए व्यक्ति यह सोचे कि मेरे कर्म जब मुझे भोगने हैं तो जितना हो सके मैं पापों से बचने का प्रयास करूं।
जैन धर्म में प्राणातिपात, मृषावाद, आदि अठारह पाप बताए गए है, इन्हें करने वाला जीव पाप का बंधन करता है। व्यक्ति यह प्रयास करे कि जानबूझ कर किसी भी प्राणी को मेरे द्वारा दुःख न पहुंचे। जानबूझकर किसी भी प्राणी की हिंसा से बचने का प्रयास करे। किसी पर झूठा आरोप नहीं लगाएं, चोरी जैसा काम न करे। जहां तक संभव हो सके इन पापों से बचने का प्रयास करना चाहिए और धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए। इस प्रकार पापों से बचने और धर्म के पथ पर चलने से आत्मा एक दिन विशुद्धता को प्राप्त हो सकती है। आचार्य प्रवर के मंगल प्रवचन के उपरान्त स्थानीय विधायक रामनिवास गावड़िया ने पूज्य प्रवर के स्वागत में अपनी भावाभिव्यक्ति दी। सीमा मेमोरियल शिक्षण संस्थान के चेयरमैन डॉ. भजनलाल, सीमाशास्त्री कॉलेज की ओर से देवाराम, सिंघवी परिवार की ओर से भूपेन्द्र सिंघवी, सुभाष पारख व नगरपालिका चेयरमैन ओमप्रकाश ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। तेरापंथ महिला मंडल-बोरावड़ ने स्वागत गीत का संगान किया।