मानव जीवन का सार है धर्म की आराधना : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

किशनगढ़। 09 जनवरी 2026

मानव जीवन का सार है धर्म की आराधना : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, तीर्थंकर महावीर के प्रतिनिधि, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अपनी धवल सेना के साथ आज प्रातः गगवाना से विहार किया और किशनगढ़ नगरी में पधारे। श्रद्धालुओं ने बुलंद जयघोष से पूजय प्रवर का हार्दिक स्वागत किया। भव्य स्वागत जुलूस में समस्त जाति धर्म के लोग सम्मिलित थे। आर. के. मार्बल ग्रुप के चेयरमेन पाटनी जी भी पूज्य प्रवर के स्वागत में उपस्थित थे। आचार्य प्रवर भव्य जुलूस के साथ किशनगढ़ के आर. के. कम्यूनिटि सेंटर में पधारे।
‘जय समवसरण’ में आयोजित मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अमृत देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि हमारी सृष्टि में नित्यता और अनित्यता दोनों स्थितियां हैं। दुनियां में नित्य चीजें भी हैं जो स्थायी है जैसे - आत्मा। आत्मा एक स्थायी तत्त्व है, जिसे कोई मार नहीं सकता, काट नहीं सकता, यह आत्मा की नित्यता की स्थिति मानी जा सकती है। इसी प्रकार आकाश भी स्थायी है। नित्यता के साथ ही परिवर्तनशीलता भी रहती है। आत्मा कभी मनुष्य, कभी देव, पशु, नारक के रूप जन्म ले लेती है और कभी मोक्ष में चली जाती है। हमारी आत्मा नित्य है परन्तु यह शरीर अनित्य है। इसलिए हम शरीर को नश्वर कह सकते हैं, जबकि आत्मा अविनश्वर है, शाश्वत है।
हमारी आत्मा की यह बहुत महत्त्वपूर्ण स्थिति है कि हमें मानव देह प्राप्त है। इस मानव देह द्वारा साधना करके आत्मा परमात्म पद को प्राप्त कर सकती है, अन्य किसी भी योनि से आत्मा मोक्ष और परमात्म पद को प्राप्त नहीं कर सकती। प्रश्न होता है कि जीवन क्यों जीना चाहिए, जीवन जीने का लक्ष्य क्या है? जीवन का एक उद्देश्य होना चाहिए। एक अच्छा उद्देश्य जीवन जीने का हो तो जीवन जीने की बड़ी सार्थकता हो सकती है। शास्त्र में कहा गया कि हमारे द्वारा जो पूर्व कर्म किए हुए हैं, उन कर्मों का क्षय करने के लिए, आत्मा को विशुद्ध बनाने के लिए यह शरीर धारण करना चाहिए, जीवन जीना चाहिए। चेतना को निर्मल बनाकर मोक्ष प्राप्त कर लेना बहुत बड़ा कर्तव्य होता है। धर्म की साधना का सबसे बड़ा लक्ष्य यही होता है कि अपनी आत्मा को पूर्वकृत कर्मों से मुक्त बना लेना और मोक्ष प्राप्त कर लेना। तप, त्याग, ध्यान, स्वाध्याय, सेवा, साधना इन सभी क्रियाओं के मूल में आत्मा को कर्मों से मुक्त बनाना होता है।
शास्त्र में कहा गया कि जिस प्रकार पेड़ से पका हुआ पान गिर जाता है उसी प्रकार यह नश्वर शरीर भी एक दिन समाप्त हो जाता है। अतः व्यक्ति को जितना भी जीवन जीना है, उसे किस प्रकार जीए, यह महत्त्वपूर्ण है। व्यक्ति अच्छा जीवन जिए, इसके लिए व्यक्ति के जीवन में ईमानदारी होनी चाहिए। अपने व्यवहार लेन-देन, व्यवहार, व्यापार में जितना संभव हो सके ईमानदारी रखने का प्रयास करना चाहिए। चोरी, धोखा-धड़ी, छल-कपट, आदि से बचना चाहिए। ईमानदारी जीवन में रहती है तो आत्मा निर्मल बन सकती है। आचार्य तुलसी द्वारा चलाए गए ‘अणुव्रत’ में भी किसी भी धर्म-सम्प्रदाय, जाति का व्यक्ति छोटे-छोटे नियमों को स्वीकार कर अपने जीवन को नैतिक और प्रामाणिक बना सकता है। यद्यपि ईमानदारी का पालन करने वाले के सम्मुख कुछ कठिनाईयां आ सकती है, उसमें भी मजबूती रखनी चाहिए। नशीली चीजों के सेवन से बचने का प्रयास करें। इन सबके साथ ही जीवन में धर्मोपासना भी चले तो मानव जीवन का यह लक्ष्य कि चेतना निर्मल बने, तो वह भी जितना हम करेंगे, सिद्ध हो सकता है। किशनगढ़ की जनता में ईमानदारी, अहिंसा, नैतिकता, व नशामुक्ति की चेतना बनी रहे।
आचार्य प्रवर के मंगल प्रवचन के उपरान्त साध्वी प्रमुखा विश्रुत विभाजी ने श्रद्धालुओं को उद्बोधन प्रदान किया। उन्होंने कहा कि अच्छा जीवन वह होता है जिसमें व्यक्ति संतोष का अनुभव करता है। अच्छे जीवन के लिए हमें लोभ की चेतना को कम करना होगा। पदार्थ के प्रति आकर्षण कम होगा तो हमें संतोष की अनुभूति होगी। इसके साथ ही जीवन में पवित्रता हो और व्यक्ति को आनंद से रहना चाहिए। तत्पश्चात् स्थानीय तेरापंथी सभा के अध्यक्ष पन्नालाल छाजेड़, तेरापंथ युवक परिषद् के अध्यक्ष रौनक घोड़ावत ने आचार्य प्रवर के स्वागत में अपनी अभिव्यक्ति दी। तेरापंथ महिला मंडल ने स्वागत गीत का संगान किया। ज्ञानार्थियों ने अपनी प्रस्तुति दी। कृषि और किसान कल्याण राज्य मंत्री श्री भागीरथ चौधरी ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति देते हुए मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। पूर्व विधायक श्री सुरेश टांक ने आचार्यश्री के स्वागत में भावाभिव्यक्ति दी।