धर्म ही शरण देने वाला है, त्राण देने वाला है : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

रलावता। 10 जनवरी 2026

धर्म ही शरण देने वाला है, त्राण देने वाला है : आचार्यश्री महाश्रमण

जन-जन के मानस को आध्यात्मिक अभिसिंचन प्रदान करने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी मार्बल नगरी किशनगढ़ में अध्यात्म की गंगा प्रवाहित करने के पश्चात् आज प्रातः लगभग 13 किमी का विहार सुसंपन्न कर रलावता में स्थित महात्मा गांधी राजकीय विद्यालय में पधारे। विद्यालय परिसर में आयोजित मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित जनता को महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन पाथेय प्रदान करते हुए फरमाया कि जैन वांग्मय में चार शरण हैं - अर्हतों की शरण, सिद्धों की शरण, साधुओं की शरण, और केवली प्रज्ञप्त धर्म की शरण है। धर्म है तभी अर्हत्, सिद्ध, और साधु हो सकते हैं। इसलिए एक शरण धर्म है, उसे अर्हतों में भी देखा जा सकता है, सिद्धों में भी देखा जा सकता है, और साधुओं में भी देखा जा सकता है। अतः धर्म ही शरण देने वाला है, त्राण देने वाला है।
जब व्यक्ति के कर्म उदय में आते हैं और कष्टानुभूति होती है तो सहयोग देने वाले सहयोग प्रदान कर सकते हैं परन्तु वेदना उस प्राणी को स्वयं ही भोगनी होती है। इसलिए धर्म ही ऐसी शरण और त्राण है जो हमेशा के लिए व्यक्ति को दुःख मुक्ति प्रदान करता है। साधु भी वर्तमान में धर्ममूर्ति हैं परन्तु फिर भी पूर्वकृत कर्मों के कारण वे भी कष्ट पा सकते हैं। अपने किए हुए कर्म पुण्य और पाप दोनों रूपों में हो सकते हैं। पाप कर्मों के उदय से कष्ट, वेदना, आदि झेलनी पड़ती है।
ऐसी स्थिति में व्यक्ति यह सोचे कि मेरा त्राण एकमात्र धर्म है और उसकी साधना करनी चाहिए धर्म की साधना करते-करते एक दिन सर्व दुःख मुक्ति-मोक्ष की स्थिति प्राप्त हो जाएगी। बुढ़ापा, बीमारी और मृत्यु को कोई रोक नहीं सकता। वैराग्य आने पर व्यक्ति साधु बन जाते हैं और वे सर्व दुःख मुक्ति के लिए ही साधु बनते हैं। इस मानव देह में कष्ट भी आ सकते हैं परन्तु साधना करते-करते एक समय आता है कि सम्यक्तवी प्राणी को केवलज्ञान की प्राप्ति हो जाती है और फिर मोक्ष की भी संप्राप्ति हो जाती है।
पूज्य प्रवर ने शिक्षकों को प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि विद्यार्थियों को पुस्तकीय ज्ञान देने के साथ-साथ अच्छे नैतिक व जीवनोपयोगी ज्ञान प्रदान करने का प्रयास करना चाहिए जिससे बालकों का बौद्धिक, मानसिक, व भावनात्मक विकास हो सके। विद्या के साथ-साथ अच्छे संस्कार भी प्रदान किए जाएं तो बहुत अच्छी बात हो सकती है। पूज्य प्रवर ने विद्यार्थियों को सद्भावना, नैतिकता, व नशामुक्ति की प्रेरणा प्रदान की। आचार्य प्रवर ने कहा कि इस प्रकार सभी के जीवन में धर्म रहे और चेतना अच्छी रहे, तो धर्म उसके लिए त्राण और शरण बन सकता है, जो परम सुख प्रदान करने वाला भी बन सकता है। आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त विद्यालय की प्रिंसीपल निर्मला फुलवारी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने उन्हें मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।