गुरुवाणी/ केन्द्र
विनय, श्रुत, तपस्या व आचार रहे तो जीवन में शांति आए : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, तीर्थंकर के प्रतिनिधि, अखंड परिव्राजक, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज प्रातः काल अजमेर से गतिमान हुए और लगभग 13 किमी, का विहार सुसंपन्न कर गगवाना में राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में पधारे। विद्यालय परिसर में आयोजित मंगल प्रवचन कार्यक्रम में महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आर्हत् वांग्मय पर आधारित अमृत देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि दशवेआलियं आगम में चार प्रकार की समाधि और चार आचार समाधि। व्यक्ति की यह कामना रहती है कि जीवन शांति में बीते। तकलीफ न आए और मानसिक उलझनें भी न आए। जिंदगी में रोटी-पानी, कपड़ां, और मकान की चिंता रहती है और इनके पूरा होने के बाद गहने-आभूषण, आदि के प्राप्त होने की चिंता हो सकती है। यद्यपि व्यक्ति को चिंता-तनाव अधिक नहीं करना चाहिए, बल्कि चिंतन करना चाहिए। कोई समस्या आती है तो उसके समाधान का रास्ता खोजने का प्रयास करना चाहिए। परन्तु दुःखी नहीं बनना चाहिए।
जीवन में शांति और समाधि का एक उपाय है कि जीवन में विनयशीलता रखें। उद्दण्डता, अहंकार, क्रोध, लड़ाई-झगड़ा नहीं करना चाहिए। समाधि का दूसरा उपाय है - श्रुत आराधना। ज्ञान की आराधना करना, स्वाध्याय करना। ज्ञान और श्रुत के मिलने से व्यक्ति का चिंतन प्रशस्त बनता है। नकारात्मक चिंतन से व्यक्ति दुःखी भी बन सकता है, सकारात्मक चिंतन से व्यक्ति को सुख और शांति की प्राप्ति हो सकती है।
शांति प्राप्त करने का तीसरा उपाय है - तपस्या। तपस्या करने से भी शांति और समाधि मिल सकती है। तपस्या करने से कई बार बीमारी भी ठीक हो जाती है और तपस्या में मन लगने से आध्यात्मिक शांति, मानसिक समाधि भी मिल सकती है। चौथा उपाय है- आचार। अपने आचरणों को अच्छा रखें। सदाचार के पथ पर चलने से भी शांति रह सकती है। अतः जीवन में विनय, श्रुत, तपस्या व आचार रहे तो जीवन शांति और समाधि मय बन सकता है। मंगल प्रवचन कार्यक्रम के दौरान समाज सेवी बिलाल खान, सरपंच गुलनाज खानम्, विद्यालय की प्रधानाचार्या वंदना वालिया ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी।