गुरुवाणी/ केन्द्र
अहिंसा से उत्पन्न होती है शांति : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमजणजी आज अपनी धवल सेना के साथ अजमेर पधारे तो अजमेर वासियों ने अपने आराध्य का अभिनन्दन किया। स्वागत जूलूस में न केवल तेरापंथ समाज अपितु जैनेत्तर समाज, इस्लाम, और ईसाई धर्म के लोग भी उत्साह के साथ उपस्थित थे। भव्य स्वागत जूलूस के साथ पूज्य प्रवर शहर में स्थित मेरवाड़ा स्टेट (कोठी) में पधारे। मेरवाड़ा स्टेट के परिसर में बने भव्य अहिंसा समवसरण में समुपस्थित जन मेदिनी को शांति दूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अमृत देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि आगम में कहा गया है कि धर्म उत्कृष्ट मंगल है। व्यक्ति के मन में स्वयं के लिए मंगल की कामना रहती है और दूसरों के लिए भी मंगल कामना प्रेषित की जाती है। कई पदार्थों को मंगल के रूप में माना जाता है और कहीं प्रस्थान करने अथवा किसी भी कार्य आदि को प्रारंभ करते समय भी शुभ मुहूर्त देखा जाता है।
शास्त्र में बहुत ऊंची बात कही गई है कि धर्म उत्कृष्ट मंगल है। प्रश्न हो सकता है कि कौनसा धर्म मंगल है? शास्त्र में किसी भी धर्म अथवा संप्रदाय का नाम न लेकर कहा गया कि अहिंसा धर्म है, संयम धर्म है, और तप धर्म है। अहिंसा, संयम, और तप रूपी धर्म मंगल है। जो भी प्राणी अहिंसा की आराधना करेगा, उसका मंगल होगा। सब प्राणियों का कल्याण करने वाली भगवती-अहिंसा होती है। किसी भी प्राणी को कष्ट नहीं देना, सब प्राणियों को अपने समान समझना। जो व्यवहार व्यक्ति स्वयं के साथ नहीं चाहता, वह व्यवहार दूसरों के साथ भी नहीं करना चाहिए, यह अहिंसा धर्म है। सभी प्राणियों के साथ मैत्री भाव हो, सद्भावना हो। अलग-अलग जाति, सम्प्रदाय के लोग हों, अलग-अलग राजनीतिक दल के लोग हों इन भिन्नताओं को लेकर दंगा-फसाद, हिंसा, आदि नहीं होनी चाहिए, सबके प्रति सद्भावना रखनी चाहिए।
जहां हिंसा है वहां अशान्ति और अहिंसा हो वहां शान्ति हो सकती है। अतः व्यक्ति को इरादतन किसी दूसरे को व्यर्थ कष्ट देने का प्रयास नहीं करना चाहिए। अहिंसा को परम धर्म कहा गया है। अतः व्यर्थ किसी को दुःख देने की भावना नहीं रखें, हो सके तो दूसरों का कल्याण करने का प्रयास करें। अहिंसा प्रायः सभी धर्मों में स्वीकार्य है। इसी प्रकार व्यक्ति अपने शरीर, वाणी और मन का संयम भी धर्म है। जो भी संयम रखेगा उसका कल्याण होगा। असंयम पाप है और संयम धर्म है। अपनी वाणी से किसी को कटु शब्द बोलने का व्यर्थ प्रयास नहीं होना चाहिए। जहां तक हो सके बेईमान, छल-कपट धोखाधड़ी के व्यवहार से बचना चाहिए। ईमानदारी भी एक बहुत अच्छा सद्गुण होता है। नैतिकता और ईमानदारी मात्र धर्म स्थान में ही नहीं कर्म स्थान में भी रखनी चाहिए। परम पूज्य आचार्यश्री तुलसी द्वारा चलाया गया कार्यक्रम ‘अणुव्रत आन्दोलन’ ऐसा कार्यक्रम है जिससे किसी भी धर्म, जाति का व्यक्ति जुड़ सकता है। इसके माध्यम से अपने जीवन को संयमित, अहिंसक, प्रामाणिक, और व्यसन मुक्त बनाया जा सकता है। व्यक्ति के पास धन होते हुए भी खान-पान, रहन-सहन आदि में सादगी रखनी चाहिए।
आचार्य प्रवर ने आगे कहा कि आज कई वर्षों के बाद अजमेर में आना हुआ है। अजमेर में खूब शांति रहे, धर्म की भावना जनता में भी बनी रहे, जनता में नशा मुक्तता का भाव रहे। मंगलकामना।
राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष श्री वासुदेव देवनानी आचार्य प्रवर के स्वागत में अपनी भावाभिव्यक्ति दी। तेलंगाना प्रदेश भाजपा के संगठन मंत्री श्री चंद्रशेखरजी ने भी अपनी श्रद्धासिक्त अभिव्यक्ति दी। दोनों ही राजनेताओं को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। स्थानीय तेरापंथ महिला मंडल की सदस्याओं ने स्वागत गीत का संगान किया। जैन सोशल ग्रुप क्लासिकल के अध्यक्ष प्रेम जैन ने अपनी अभिव्यक्ति दी। ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने गीत की प्रस्तुति दी। तेरापंथ युवक परिषद के सदस्यों ने भी गीत का संगान किया। अजमेर की बहिन-बेटियों ने गीत की प्रस्तुति दी। ऋतु सोगानी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी।