गुरुवाणी/ केन्द्र
ईमानदारी के मार्ग पर आगे बढ़ने का रहे प्रयास : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण भीषण सर्दी में अपनी धवल सेना के साथ लगभग 14 किमी का विहार कर तबीजी में स्थित कच्छावा रिसोर्ट में पधारे। प्रातःकालीन मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में समुपस्थित जनता को अमृत देशना प्रदान करते हुए युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने फरमाया कि हम यात्रा में तीन बातें बताते हैं—सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति। सद्भावना यानी सबके साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार करना। जाति, संप्रदाय, राजनीतिक दल आदि की भिन्नता के आधार पर लड़ाई-झगड़ा, दंगा-फसाद, हिंसा-हत्या आदि में नहीं जाना चाहिए। सबके साथ सौहार्द्र का भाव या अवैर की भावना रखना ही सद्भावना है। नैतिकता अर्थात् ईमानदारी। नशामुक्ति यानी शराब, सिगरेट, गुटखा आदि अहितकर वस्तुओं से बचकर रहना।
नैतिकता और ईमानदारी सर्वोत्तम नीति है। झूठ, कपट और चोरी—ये ईमानदारी में बाधक तत्व हैं। जो व्यक्ति इन तीनों से बचकर रहता है, इसका अर्थ है कि उसमें ईमानदारी का गुण बहुत अच्छे ढंग से विकसित होता है। जो व्यक्ति झूठ नहीं बोलता, कपट और चोरी नहीं करता, उसमें ईमानदारी की दृष्टि से गहरी पवित्रता आ सकती है। ईमानदारी का मार्ग कुछ कठिन भी हो सकता है। रास्ता कष्टप्रद और ऊबड़-खाबड़ हो सकता है, परंतु उसकी मंज़िल बहुत अच्छी होती है। व्यक्ति को थोड़ी कठिनाई भले ही हो जाए, पर ईमानदारी के पथ को नहीं छोड़ना चाहिए। कोई रास्ता भले ही अच्छा हो, पर यदि उसकी मंज़िल अच्छी नहीं है तो ऐसे रास्ते पर चलने का कोई लाभ नहीं है।
जो व्यक्ति झूठ बोलने वाला होता है, उस पर से लोगों का भरोसा उठ जाता है। ईमानदारी और सच्चाई की राह पर चलने वाले व्यक्ति पर लोगों का विश्वास दृढ़ हो जाता है। हमें मनुष्य जीवन मिला है और जीवन बहुत छोटा है। अतः इस जीवन में हमें मोक्ष की ओर गति करने की साधना करने का प्रयास करना चाहिए। चार गतियाँ—नरक गति, तिर्यंच गति, मनुष्य गति और देवगति—में मनुष्य गति ही ऐसी है जिससे जीव मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। अन्य किसी भी योनि से मोक्ष-प्राप्ति संभव नहीं है। इसलिए चौरासी लाख जीव योनियों में मनुष्य जन्म प्राप्त होना दुर्लभ है। इस मनुष्य जीवन का व्यक्ति को पूर्ण लाभ उठाने का प्रयास करना चाहिए। अन्य गतियों में कोई भी जा सकता है, परंतु मोक्ष गति में केवल मनुष्य ही जा सकता है। अतः इस मनुष्य जीवन में ईमानदारी और सच्चाई की राह पर चलने में कठिनाई हो तो भी, सच्चाई और ईमानदारी के मार्ग पर आगे बढ़ने का निरंतर प्रयास करना चाहिए।