धर्म है उत्कृष्ट मंगल

स्वाध्याय

-आचार्यश्री महाश्रमण

धर्म है उत्कृष्ट मंगल

आचार्य श्री तुलसी ने अपने आचार्य-काल में तीन साध्वी-प्रमुखाओं की नियुक्तियां की-
१. साध्वी-प्रमुखाश्री झमकूजी, वि. सं. १९६३
२. साध्वी-प्रमुखाश्री लाडांजी, विः सं २००३
३. साध्वी-प्रमुखाश्री कनकप्रभाजी, वि. सं. २०२८
तेरापंथ के अन्य किसी भी आचार्य ने एक से अधिक साध्वी प्रमुखाओं को नियुक्तियां नहीं की।
आचार्य-युवाचार्य का सह नेतृत्व
श्रीमज्जयाचार्य ने वि. सं. १९२० में मुनि श्री मघवा को अपने युवाचार्यं के रूप में मनोनीत किया और उसके बाद प्रत्येक चतुर्मास में जयाचार्य और युवाचार्य श्री मघवा साथ में रहे।
आचार्यश्री तुलसी ने वि. सं. २०३५ में महाप्रज्ञ मुनि श्री नथमलजी को अपने युवाचार्य के रूप में मनोनीत किया और तब से आज तक प्रत्येक चातुर्मास में दोनों साथ में रह रहे हैं। जयाचार्य और युवाचार्य मघवा का १८ वर्षों तक संघ को यह नेतृत्व मिला। श्री तुलसी और श्री महाप्रज्ञ का १८ वर्षों से संघ को नेतृत्व मिल रहा है। लम्बे काल तक गुरू-आचार्य का सह-सान्निध्य संघ को मिलता रहे, यही मंगल कामना है।
नई भाषा के विद्वानों का प्रादुर्भाव
श्रीमज्जयाचार्यं के समय संस्कृत के विद्वान् साधु तैयार हुए और आचार्यश्री तुलसी के समय हिन्दी और अंग्रेजी के विद्वान साधु तैयार हुए हैं।
आचार्य भिक्षु के कुशल भाष्यकार
आचार्य भिक्षु तथा उनके सिद्धांतों को साहित्य के रूप में प्रस्तुत करने वाले प्रमुख रूप से तेरापंथ में दो ही आचार्य हुए है- श्रीमज्जयाचार्यं और आचार्य श्री तुलसी। श्रीमज्जयाचार्य ने 'भिक्षु म्हार प्रगट्याजी भरत खेतर में' आदि गीतिकाओं के माध्यम से भिक्षु स्वामी के प्रति अपनी अगाध श्रद्धा व्यक्त की एवं 'भ्रम विध्वंसनम्' आदि ग्रंथों के माध्यम से उनके सैद्धांतिक पक्ष का विवेचन किया।
आचार्य श्री तुलसी ने भिक्षु स्वामी के प्रति बहुत से भक्तिपूर्ण गीत रचे हैं। उनमें 'म्हानै सिरियारी रो संत प्यारो-प्यारो लगे' 'घणां सुहावो माता दीपांजी रा जाया' आदि प्रमुख हैं। आचार्यश्री ने आधुनिक परिपरक्ष में भिक्षु स्वामी के सिद्धांतों को व्याख्यात कर उनको महान् दार्शनिक को कोटि में प्रस्तुत किया है।
अपने शासन काल में दीक्षित साध्वी का साध्वी-प्रमुखा के रूप में चयन
श्रीमज्जयाचार्य ने वि. सं. १६०८ में दीक्षार्थिनी गुलाबांजी को दीक्षित किया तथा वि. सं. १६२७ में उनको साध्वी-प्रमुखा के रूप में मनोनीत किया।
आचार्य श्री तुलसी ने वि. सं. २०१७ में दीक्षार्थिनी कलावती जी (वर्तमान में साध्वीप्रमुखा कनकप्रभाजी) को दीक्षित किया तथा वि. स. २०२८ में उनको साध्वी-प्रमुखा बनाया। अपने शासनकाल में दीक्षित साध्वी को साध्वी-प्रमुखा बनाने का अवसर तेरापंथ के अन्य किसी भी आचार्य को नहीं मिला।
अन्तरंग विरोध
श्रीमज्जयाचार्य के समय साधु-साध्वियों का एक बड़ा दल संघ से अलग हुआ और उनका विरोध जयाचार्य ने सहा। आचार्य श्री तुलसी के समय में भी दो बार बड़ी संख्या में साधु-साध्वियां संघ से अलग हुए। उनके निमित्त से होने वाला संघर्ष आचार्य श्री तुलसी ने सहा।
उत्सवों का प्रारंभ
जयाचार्य ने पट्टोत्सव (वर्तमान आचार्य का आचार्यपदारोहण दिवस), चरमोत्सव (भिक्षु स्वामी का स्वर्गारोहण दिवस, भाद्रव शुक्ला त्रयोदशी) एवं मर्यादा महोत्सव (माघ शुक्ला सप्तमी) को उत्सव के रूप में मनाना शुरू किया।
आचार्य श्री तुलसी ने तेरापंथ द्विशताब्दी समारोह, जयाचार्य निर्वाण शताब्दी समारोह, कालू जन्म शताब्दी समारोह आदि शताब्दी समारोहों को उत्सवों के रूप में मनाया।
इस प्रकार श्रीमज्जयाचार्य और युगप्रधान आचार्यश्री तुलसी के महान् जीवन के विभिन्न पहलुओं में समानता उपलब्ध होती है।