संबोधि

स्वाध्याय

-आचार्यश्री महाप्रज्ञ

संबोधि

सम्राट् जब भी भोजन करता, सुदर्शन इस गाथा को प्रतिदिन सुनाता। सम्राट् की आदत बदल गयी, वह परिमित भोजी हो गया।
आचार्य ने उन व्यक्तियों के लिए अवमौदर्य तप का निर्देश किया है जो पित्त के प्रकोपवश उपवास करने में असमर्थ हैं, जो उपवास से अधिक थकान महसूस करते हैं, जो अपने तप के माहात्म्य से भव्य जीवों को उपशांत करने में लगे हैं, जो अपने उदर में कृमि की उत्पत्ति का निरोध करना चाहते हैं और जो व्याधिजन्य वेदना के कारण अतिमात्रा में भोजन कर लेने से स्वाध्याय के भंग होने का भय करते हैं।
ऊनोदरी के फल ये हैं-
१. इन्द्रियों की स्वेच्छाचारिता मिट जाती है।
२. संयम का जागरण होता है।
३. दोषों का प्रशमन होता है।
४. संतोष की वृद्धि होती है।
५. स्वाध्याय की सिद्धि होती है।
ऊनादेरी-यह सांकेतिक शब्द है। इसे हम केवल भोजन से ही संबंधित न करें। भोजन स्थूल है। जहां भी जिस वस्तु में मात्रा का अतिक्रमण होता हो, वहां सर्वत्र संयम की साधना है। आसक्ति के प्रवाह को अमर्यादित नहीं होने देता है, तथा क्रोध, अहंकार आदि दोषों का भी नियमन करता है।
(3) वृत्तिसंक्षेप
वृत्ति शब्द के दो अर्थ हैं-जीविका और चैतसिक प्रवृत्तियां। योगशास्त्र चित्तवृत्ति के निरोध का दर्शन देता है। प्रमाद, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति-ये पांच वृत्तियां हैं। इनका संपूर्ण निरोध करना योग का चरम लक्ष्य है। वृत्तियों के कारण चित्त शुद्ध नहीं रहता। अशुद्ध चित्त में परमात्मा का अवतरण नहीं होता।
वृत्तिसंक्षेप का अर्थ है-जीविका निर्वाह (भोजन) को विविध संकल्पों से संक्षिप्त करना। जैसे-अमुक पदार्थ मिले तो आहार करना, अमुक व्यक्ति दे तो लेना, आदि। महावीर का संकल्प प्रसिद्ध है। उन्होंने निर्णय किया कि अगर छह महीनों के भीतर संकल्प पूरा हो तो भोजन करना, अन्यथा छह महीने तक भोजन नहीं करना। भिक्षा के लिए रोज घूमते। पांच महीने पचीस दिन पूरे हो गये। संकल्प नहीं फला। छब्बीसवें दिन सब संयोग मिलने पर प्रतिज्ञा पूर्ण हुई और तब आहार ग्रहण किया।