रचनाएं
सतयुग सा हमको मिला
सतयुग सा हमको मिला- भैक्षवगण सुखकार
आत्मार्थी नर के लिए - आत्मोन्नति का द्वार।।
गुरु तुलसी मुखकमल से - दीक्षा की स्वीकार
महाप्रज्ञ महाश्रमण की - कृपा मिली अनपार।।
मनुयशाजी ने किया - अपना बेड़ा पार
सही वेदना साम्य से - मन में दृढ़ताधार।।
समणी बन साध्वी बनी - गुरु आज्ञानुसार
की थी धर्म प्रभावना - निज शक्ति अनुसार।।
जन्मी थी मेवाड़ में - गंगाणे प्रस्थान
बना गई है संघ में - अपना ऊँचा स्थान।।
विशदप्रज्ञा लब्धियशा - सतियों का सहयोग
श्रावक गंगाशहर के - सेवा सह उपयोग।।
मनन ध्रुव ने मनुयशा - को अंतिम सहयोग
दिया खूब उत्साह से - सहज मिला संयोग।।
क्रमशः करके साधना - प्राप्त करो शिव स्थान
संत कमल श्रेयांस के - हैं हार्दिक अरमान ।।