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सही दिशा देती मर्यादा
आज के कई युवाओं के लिए मर्यादा शब्द सुनते ही थोड़ी असहजता हो जाती है। यह शब्द उन्हें ऐसा लगता है जैसे उनकी आज़ादी, सोच और अपने तरीके से जीने की इच्छा पर रोक लगाई जा रही हो। जिस समय में हम खुलकर जीने और अपने फैसले खुद लेने की बात करते हैं, वहाँ मर्यादा एक सहारे की जगह रुकावट जैसी लगने लगती है। ऐसा महसूस होता है कि यह बिना पूछे कुछ सीमाएँ तय कर देती है।
यह सोच यूँ ही नहीं बन जाती। बचपन से ही हम अपने आसपास अनुशासन और नियमों से जुड़ी कई बातें सुनते हैं। बड़े-बुज़ुर्ग अपने अनुभव बताते हैं—कितनी सख़्ती थी, कितने त्याग करने पड़े, और कैसे नियमों का पालन करना ज़रूरी था।
ये बातें भले ही अच्छे भाव से कही जाती हों, लेकिन धीरे-धीरे मन में यह बैठ जाता है कि मर्यादा कोई भारी चीज़ है, जिसे समझने से ज़्यादा निभाना पड़ता है। लेकिन यहीं रुककर एक सवाल खुद से पूछना ज़रूरी है। क्या मर्यादा सच में हमें रोकने के लिए बनी है, या फिर हमने उसे सही तरह से समझने की कोशिश ही नहीं की?
इसे एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है। जब नदी मर्यादा में बहती है, तब वही पानी खेतों को सींचता है, हरियाली लाता है और विकास का कारण बनता है। लेकिन जब वही नदी मर्यादा से बाहर जाकर उफान पर होती है, तो जीवन देने के बजाय तबाही मचा देती है। पानी वही होता है, शक्ति वही होती है—फर्क सिर्फ उसकी दिशा और मर्यादा का होता है।
यहीं पर तेरापंथ की मर्यादा एक अलग सोच सामने रखती है। तेरापंथ में मर्यादा को किसी दबाव या मजबूरी की तरह नहीं, बल्कि समझ और विश्वास पर आधारित व्यवस्था माना गया है। यहाँ सभी साधु-साध्वियाँ एक ही आचार्य के मार्गदर्शन में चलते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि अपनी सोच खत्म हो जाती है, बल्कि यह भरोसा होता है कि आचार्य सत्य के मार्ग पर चलाते हुए महावीर के सिद्धांतों को सही रूप में आगे बढ़ाएँगे। इससे दिशा साफ़ रहती है और भ्रम की स्थिति नहीं बनती।
तेरापंथ की मर्यादा की सबसे अच्छी बात यह है कि यह व्यक्ति के विकास को नहीं रोकती। मर्यादा में रहते हुए भी इंसान सीखता है, बदलता है और आगे बढ़ता है। सोच परिपक्व होती
है, व्यवहार में संतुलन आता है और व्यक्तित्व धीरे-धीरे निखरता है। यहाँ अनुशासन का मतलब दबाव नहीं, बल्कि सही दिशा में बढ़ना है।
इस बात को आचार्य तुलसी के जीवन से आसानी से समझा जा सकता है। केवल बाईस वर्ष की उम्र में आचार्य बनने के बाद भी उनसे उम्र और अनुभव में बड़े साधुओं ने उन्हें पूरे सम्मान के साथ स्वीकार किया। यह तेरापंथ की मर्यादा में मौजूद विश्वास को दिखाता है। आचार्य तुलसी ने परंपराओं को संभालते हुए समाज को आगे बढ़ाने का काम किया। उन्होंने यह ध्यान रखा कि तेरापंथ समय के साथ चले, रूढ़िवादी न बने, लेकिन मूल सिद्धांत भी न टूटें। आज के समय में तेरापंथ की मर्यादा हमें यह सिखाती है कि नेतृत्व ज़बरदस्ती से नहीं, ज़िम्मेदारी से आता है।
युवाओं के लिए यह समझ बहुत काम की हो सकती है। अगर मर्यादा को बोझ की तरह देखने के बजाय उसे जीवन को सही दिशा देने वाला सहारा माना जाए, तो उसका अर्थ ही बदल जाता है।
मर्यादा रोकती नहीं है—वह हमारी ऊर्जा को सही दिशा देती है, ताकि हम संतुलन और समझ के साथ आगे बढ़ सकें।