साधक का सुरक्षा कवच है मर्यादा पत्र

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मुनि कुमुद कुमार

साधक का सुरक्षा कवच है मर्यादा पत्र

तेरापंथ की आन, बान और शान है मर्यादा। बहुत नाज होता है आचार्य श्री भिक्षु की उस दूरदर्शी सोच पर जिसने मर्यादाओं का निर्माण किया।वि.सं.1832 में प्रथम मर्यादा पत्र लिखा गया। समय समय पर मर्यादाओं का विस्तार हुआ। वि.सं. 1859 में अंतिम मर्यादा पत्र लिखा गया।161 वर्ष पूर्व बालोतरा में श्रीमद् जयाचार्य ने इसे मर्यादा महोत्सव के रुप में मनाना प्रारंभ किया। मर्यादा बंधन नही मुक्ति का द्वार है। मर्यादा जीवन का भार नहीं श्रृंगार है। भौतिक एवं पदार्थवादी युग में जहां हर कोई स्वतंत्र रहना चाहता है, वहां एक गुरु के नेतृत्व में संयम जीवन का पालन करना प्रेरक एवं अनुकरणीय है। तेरापंथ यानी अपने अहंकार एवं ममकार का विसर्जन। अहंकार के वशीभूत बड़े बड़े साधक संयम पथ से विमुख हो गए। नाम,यश, कीर्ति का ममत्व, संयमी जीवन के उपयोगी उपकरणों के प्रति मोह का भाव साधक को संसार समुद्र में भटका देता है।सारणा एवं वारणा के द्वारा आचार्य अपने शिष्य- शिष्याओं का सम्यक् विकास करते है।गलती का परिष्कार होना अनिवार्य है, अन्यथा प्रमाद के कारण अनेक समस्या पैदा हो जाती है। अपनी अपनी क्षमता एवं योगयता अनुसार उन्हें प्रोत्साहन मिलता है तभी व्यक्तित्व का विकास होता है। साधु की साधना उज्ज्वलतम होती है। शिष्य का गुरु के प्रति समर्पण तथा गुरु का शिष्य के योगक्षेम का चिंतन यह है तेरापंथ की विशेषता।डोर से बंधी पतंग ऊंची आकाश में उड़ती है।डोर से टूटते ही पतंग नीचे गिर जाती है।बंधा हुआ झाड़ू कचरा साफ करता है। बिखरा हुआ झाड़ू खुद कचरा बन जाता है। जहां संगठन, व्यवस्था, मर्यादा है वहीं परिवार, समाज एवं संघ विकास के पायदान पर चढ़ता हुआ आगे बढ़ता है।आचार्य श्री भिक्षु का यह तेरापंथ धर्मसंघ आज सात समुंदर पार भगवान महावीर स्वामी के सिद्धांतो एवं तेरापंथ धर्मसंघ के अवदानों के द्वारा अपनी विरल पहचान बनाई है।आचार्यों की प्रज्ञा, साधना,समयज्ञता, दूरदर्शिता, मौलिक चिंतन से चतुर्विध धर्मसंघ का आध्यात्मिक विकास हो रहा है। पांच महाव्रत, पांच समिति एवं तीन गुप्ति साधु जीवन का मूल आधार है। छद्मस्थता के कारण प्रमाद हो सकता है। अप्रमाद के प्रति जागरूकता बनीं रहें। संघ में साधु साध्वी का आपसी सौहार्द, समन्वय बना रहे। एक दूसरे के संयमी जीवन में सहयोगी बनकर आत्मसाधना करते रहे इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर आचार्य श्री भिक्षु ने मर्यादाओं का निर्माण किया। साधु साध्वी की तरह श्रावक समाज के लिए भी श्रावक निष्ठा पत्र का निर्माण हुआ जो कि श्रावक को अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक करता है। धर्मसंघ के सदस्यों के प्रति आचार्य श्री का निष्पक्ष भाव ने ही संघ को विकास की ओर गतिमान किया है। चतुर्विध धर्मसंघ का चिंतन रहें संघ हमारा है हम संघ के है। तेरापंथ धर्मसंघ से हमें बहुत कुछ मिला है।संघ हमारा त्राण है,शरण है। हमारा दायित्व बनता है कि संघ विकास में योगदान दें जिससे संघ के ऋण से यत्किंचित उऋण हो सके।गण गणपति के प्रति पूर्ण निष्ठावान रहकर धर्मसंघ की गरिमा को अपनी महिमा मानकर संघ की प्रभावना करते रहे।162 वां मर्यादा महोत्सव के अवसर पर अपनी भीतर की आंखों से स्वयं को टटोल कर गहराई से विचार करना चाहिए कि मेरे आचार- विचार, संस्कार,व्यवहार, कार्यशैली संघ विकास में योगभूत है या नही ? साधु लेखपत्र एवं मर्यादा पत्र को अपना सुरक्षाकवच मानकर सदैव उसके प्रति समर्पित रहे। श्रावक समाज श्रावक निष्ठा पत्र एवं आचार्य श्री तुलसी द्वारा रचित श्रावक सम्बोध का बार-बार परायण करता रहें।
नमन परम उपकारी,सजग साधक, सिद्धयोगी, उपशांत कषायी, मनौ वैज्ञानिक,पारखी पुरुष, सर्वोच्च ज्ञान से परिपूर्ण,भगवान महावीर के परम उपासक आचार्य श्री भिक्षु को। उनकी द्वारा रचित मर्यादा साधक के लिए मील का पत्थर है।