मर्यादोत्सव मन भाएं

रचनाएं

साध्वी वर्धमानयशा

मर्यादोत्सव मन भाएं

मर्यादा की मंगल महिमा गाएं, मर्यादोत्सव मन भाएं
मर्यादा पुरूषोत्तम भिक्षु तुमको आज बधाएं
जयाचार्य की दूर दृष्टि से यह त्यौहार मनाएं।।
अंधेरी ओरी में भिक्षु ने आलोक बिखेरा
हाथ जोड़कर बोले नत हो पंथ प्रभो यह तेरा
भिक्षु ने शासन की नींव गहरी लगाई है,
जयाचार्य ने इसकी महिमा शिखरों चढ़ाई है
गण उजियारा, है रखवारा, मिलता इससे सबल सहारा
गण मेरा है, मैं हूं गण का यह संकल्प सजाएं
गण-गणपति की भक्ति हमारे रोम-रोम रम जाएं
सौभागी हैं हम सारे गुरू महाश्रमण को पाएं।।
जैन धर्म की तेरापंथ बढ़ा रहा है शान,
एक गुरू और एक विधान है इसकी पहचान
गुरू आज्ञा लक्ष्मण रेखा है, गुरू आज्ञा ही त्राण
संघ चतुर्विध गुरू आज् पर करें प्राण कुर्बान
विनय, समर्पण और अनुशासन, मर्यादा पर टिका यह शासन
जय-जय शासन जय मर्यादा मंगल घेष लगाएं
दसों दिशाओं में गूंजित है इसकी यश गाथाएं।।
मर्यादित यह संघ हमारा लगता सबको प्यारा,
कलयुग में सतयुग सा देख रहे हैं नजारा,
मर्यादा में रहने वाला पाता है सम्मान,
लांघी जिसने मर्यादा मिट जाता नामो निशान
देखो नदियां चाहे समन्दर, छोड़ी सीमा तो प्रलय भयंकर
नम में तारा चम-चम करता सबके मन को भाएं।
अम्बर से धरती पर आएं तो पत्थर कहलाएं।।
तर्ज - कितना प्यार तुझे