तेरापंथ धर्मसंघ का कुंभ मेला - मर्यादा महोत्सव

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मुनि चैतन्य कुमार ‘अमन’

तेरापंथ धर्मसंघ का कुंभ मेला - मर्यादा महोत्सव

मर्यादा, सिद्धान्त संविधान नियम कानून- ये सारे के सारे शब्द बोलने पढ़ने में अलग-अलग होते हुए भावार्थ में एकार्थक लगते है। जितने ये आसान सहज सरल लगते है उतने में पालन करने में कठिन प्रतीत होते है। मर्यादा-नियम-कानून मात्र संघ समाज परिवार की दृष्टि होते है। सामूहिक जीवन में मर्यादा का होना अपेक्षित होता है। कहा जा सकता है अपेक्षित ही नहीं बल्कि अनिवार्य भी है। मर्यादा के अभाव में कोई संगठन सुचारू रूप से नहीं चल सकता। कानून, मर्यादा और व्यवस्थागत नियमों से ही मर्यादित अनुशासित और सुसंगठित समाज वराष्ट्र का निर्माण होता है।
बिना मर्यादा संविधान के किसी संघ समाज और राष्ट्र को सुचारू रूप से चलाना नामुमकिन लगता है। यद्यपि प्रत्येक संघ समाज और राष्ट्र की मर्यादा एक जैसी नहीं होती सबका चिन्तन-विकास अलग-अलग रूपों में होने से कुछ नियम कानून-मर्यादा अपने ढ़ग से होते है। प्रश्न उभरकर सामने उपस्थित होता है मर्यादाएं क्या, अनुशासन क्यों और किसके लिए। पशुओं का समूह होता है उसके लिए उनका कोई चिन्तन नहीं होता, उन पर भी नियम कानून मनुष्य कृत होते है। उनको जहां बांधते है वहीं बंधे रहते है, जो देते है खाना होता है जैसी परिस्थिति में रखते है उसी अनुसार रहना उनकी मजबूरी है। वे चाहते हुए अपनी इच्छानुसार करना उनके लिए संभव प्रतीत नहीं होता उनमें बुद्धि का ज्ञान का विकास तो होता है परंतु उसका उपयोग करना उनके वश की बात नहीं। प्रत्येक समाज में साधु संस्था का अपना एक अलग ही महत्व होता है।
धार्मिक संगठन का भी भारतीय भूमि पर अलग-अलग विधान है। दूरदर्शी, अपूर्वमेधा के धनी श्री भिक्षु स्वामी ने अपनी उच्च स्तरीय सोच और चिन्तन को लेखनी बद्ध करने के बाद धर्मसंघ में तत्कालीन संतों के समक्ष प्रस्तुत कर उनकी रजामंदी के बाद उन्होंने ये मर्यादाएं लागू की। वो भी प्रसन्न मन से स्वीकृत करवाई। उन्होंने स्पष्ट कहा- जिसका मन साक्षी दे भली भांति साधुपन पलता जानेगण में तथा अपने आप में साधुपन माने तो गण में रहे तथा इन मर्यादाओं को स्वीकार करे। उन्होंने कहा-छल कपटपूर्वक गण में रहने का त्याग है। आज जो तेरापंथ का वटवृक्ष जिस गति से विकसित हुआ उसमें आचार्य भिक्षु की श्रमशीलता दूरदर्शिता का सर्वाधिक उच्च स्थान है। यद्यपि उत्तरवर्ती आचार्यों ने समय की नजाकत को देखते हुए इसकी श्रीवृद्धि में अथक परिश्रम किया तथा वर्तमान आचार्य श्री महाश्रमणजी भी सुदूर प्रान्तों की दीर्घकालीन यात्राओं में इसकी जड़ों को ओर अधिक मजबूत की है, कर रहे हैं।
वर्तमान में भी एकादशम अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमणजी स्वयं अपने श्रम समय और समझ का नियोजन करते हुए साधु-साध्वियों तथा श्रावक-श्राविका समाज के लिए प्रयत्नरत रहते है। प्रतिवर्ष यह मर्यादा महोत्सव माघ शुक्ला सप्तमी को होता है। कहां करना निर्धारण इसका स्थान आचार्य स्वेच्छा से निश्चित करते है। इस प्रकार तेरापंथ का मर्यादा महोत्सव कुंभ के मेले के समान है।