गुरुवाणी/ केन्द्र
धर्म है उत्कृष्ट मंगल : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी 162वें मर्यादा महोत्सव के आयोजन के लिये आज प्रातः छोटी खाटू की ओर गतिमान हुए। लगभग 11 कि.मी. का विहार कर पूज्य प्रवर जैसे ही खाटू की सीमा में पधारे तो मानों जनता व उनकी श्रद्धा का सैलाब उमड़ पड़ा। उपस्थित जनसमूह ने जुलूस का रूप में लिया। तेरापंथ समाज की सभी संस्थाओं के सदस्य अपने-अपने गणवेश में सुसज्जित दिखाई दे रहे थे। मार्ग में डीडवाना विधायक श्री युनूस खान भी आचार्यश्री के स्वागत में उपस्थित थे। लगभग डेढ़ कि.मी. के अनुशासनत्म जुलूस के साथ युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी छोटी खाटू में मर्यादा महोत्सवकालीन प्रवास हेतु तेरापंथ भवन में पधारे।
आचार्यश्री के मंगल महामंत्रोचार के साथ आज का कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। तेरापंथ महिला मंडल, छोटी खाटू ने स्वागत गीत का संगान किया। जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा के अध्यक्ष डालचंद धारीवाल ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। मर्यादा महोत्सव व्यवस्था समिति के अध्यक्ष एवं संस्था शिरोमणी तेरापंथी महासभा के अध्यक्ष मनसुखलाल सेठिया ने अपने हृदयोद्गार व्यक्त किया।
साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने इस अवसर पर अपना उद्बोधन प्रदान करते हुए कहा कि परम पूज्य आचार्यश्री महाश्रमणजी आज छोटी खाटू में मर्यादा महोत्सव मनाने के लिये आए हैं। नाम छोटा है पर ऐसा लगता है कि खाटूवासियों का मन छोटा नहीं है। मन बड़ा होने के कारण ही मर्यादा महोत्सव इन्होंने प्राप्त किया है। आज खाटूवासियों का उल्लास दर्शनीय था। सभी कौमों के लोगों में जबरदस्त उत्साह था।
आचार्यश्री का आकर्षण कुछ ऐसा है कि वे जहां पधारते हैं लोगों का सैलाब खिंचा चला आता है। इसका कारण है पूज्य प्रवर का संयम और उसकी कथनी व करनी में समानता का होना। इन विशेषताओं के कारण ही मानों लोग उनकी ओर खिंचे चले आते हैं। मैं मंगलकामना करती हूं कि मर्यादा महोत्सव योगक्षेम वर्ष की पृष्ठभूमि में हो रहा है, हम सबके लिये मंगलमय बने। युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने चतुर्विध धर्मसंघ को अमृत देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि मंगल सभी के लिये अभीष्ट होता है। पदार्थ मुहूर्त आदि भी मंगल हो सकते हैं, परंतु आगमकार ने बताया कि ‘धर्म उत्कृष्ट मंगल है।’ प्रश्न होता है कि कौनसा धर्ममंगल होता है? आगमकार ने बताया - अहिंसा धर्म मंगल है, संयम धर्म मंगल है, और तप धर्म मंगल है। अहिंसा धर्म को कौन अस्वीकार कर सकता है? यह संप्रदायातीत धर्म है। जिसके जीवन में अहिंसा की साधना है, वह जीवन भी मंगल है, वह आत्मा भी मंगल है। सब प्राणियों को अपने समान समझना - जैसे मुझे सुख प्रिय है और दुःख अप्रिय है वैसे ही और प्राणियों को भी सुख प्रिय और दुःख अप्रिय हो सकता है अतः व्यर्थ किसी को कष्ट पहुंचाने का प्रयास न करूं। संयम धर्म मंगल है, अपने शरीर, मन और वाणी तथा इन्द्रियों पर नियंत्रण रखना संयम धर्म है। तप धर्म है, तपस्या जीवन में है तो तेजस्विता की प्राप्ति हो सकती है। तपस्या के बारह प्रकार हैं तथा निरवद्य श्रम करना भी एक तप है। शुभ योग तप है। जिस व्यक्ति का मन सदा धर्म में रत रहता है उसे देवता भी नमस्कार करते हैं।
आज छोटी खाटू में मर्यादा महोत्सव के संदर्भ में आए हैं। इतने संतों का समागम हुआ है। साध्वी प्रमुखाजी सहित इतनी साध्वियां, समणियां व मुमुक्षु भी यहां उपस्थित है। यह तेरापंथ धर्मसंघ का 162वां आयोजन है। मर्यादा और आत्मानुशासन जीवन के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं। हमारे धर्मसंघ में अनुशासन और मर्यादाओं पर विशेष ध्यान दिया गया है। मर्यादाओं का पालन करने वाले भी अच्छे होते हैं। यहां के लोगों में खूब मैत्री भाव बना रहे। व्यवस्था समिति से जुड़े हुए लोग और सभी लागे खूब धार्मिक और आध्यात्मिक शक्ति से इस आयोजन को सुसंपन्न करने का प्रयास करें।
अलग-अलग क्षेत्रों में चातुर्मास की संपन्नता के उपरान्त गुरुदर्शन करने वाली साध्वी जिनरेखा जी, साध्वी संपूर्णयशाजी, व साध्वी मेघप्रभा आदि साध्वियों ने तथा साध्वी क्षीतिप्रभाजी ने अपनी सहवर्ती साध्वियों के साथ गीत का संगान किया।