गुरुवाणी/ केन्द्र
ज्ञान से प्राप्त होता है करणीय-अकरणीय का विवेक : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी आज सोमवार को प्रातः मनाना गांव से अपनी धवल सेना के साथ गतिमान हुए और लगभग 15 किमी का विहार सुसंपन्न कर रानीगांव के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में पधारे। विद्यालय परिसर में समुपस्थित श्रद्धालुओं को अमृत देशना प्रदान करते हुए शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने फरमाया कि हमारे जीवन में ज्ञान का बहुत महत्त्व है। अज्ञान एक प्रकार का अंधकार है। अज्ञान से दुःख पैदा हो सकता है। क्रोध, मान, माया, लोभ आदि से भी खराब अज्ञान होता है क्योंकि ज्ञान के बिना करणीय-अकरणीय का विवेक नहीं आता है।
शिक्षा-संस्थानों में अज्ञान को दूर करने का प्रयास किया जाता है। विद्यार्थियों को ज्ञान देने का प्रयास विद्यालयों में किया जाता है। ज्ञान एक पवित्र चीज है। ज्ञान अनेक विषयों का हो सकता है परन्तु साथ में आध्यात्मिक ज्ञान हो जाए और सम्यक् दृष्टि प्राप्त हो जाए, सम्यक्त्व प्राप्त हो जाए तो वह बहुत बड़ी उपलब्धि होती है। सम्यक् ज्ञान और सम्यक्त्व बहुत बड़ा रत्न है। सम्यक् ज्ञान होने के बाद जीवन में आचरण भी अच्छा रखना चाहिए। ज्ञान और आचार दोनों मिल जाते हैं तो बहुत बड़ी संपत्ति हो जाती है। विद्यालयों में ज्ञान के साथ-साथ अच्छे संस्कार भी देना चाहिए।
चौरासी लाख जीव योनियों में मानव जीवन बहुत महत्त्वपूर्ण और दुर्लभ है। हमें यह मानव जीवन अभी प्राप्त है, इस मानव जीवन को पापों में नहीं गवाना चाहिए। जीवन में ईमानदारी रहे, धोखाधड़ी नहीं करें, किसी के बारे में झूठी बात नहीं बोलें, हिंसा से दूर रहें, इन सबका पालन करने का प्रयास करना चाहिए। क्रोध से बचकर शांति में रहें। नशा व अन्य अहितकर चीजों से बचना चाहिए, संयम रखना चाहिए। इन सबके अलावा जितना समय मिले धर्मोपासना- जप, ध्यान, स्वाध्याय, आदि करने का प्रयास करना चाहिए। अतः जीवन में सम्यक् ज्ञान, सम्यक दर्शन, और सम्यक् आचरण हो तो आत्मा का कल्याण हो सकता है। आज रानीगांव में आए हैं गांव में अच्छी धार्मिक भावना रहे। गांव की ओर से गांव के ठाकुर नरेन्द्र सिंह व विद्यालय के प्रधानाचार्य रामावतार शर्मा ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी।