गुरुवाणी/ केन्द्र
ज्ञान, दर्शन, चारित्र को वर्धमान करने का रहे प्रयास : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी के आध्यात्मिक आलोक से पूरी बोरावड़ नगरी आलोकित हो रही है। वर्धमान महोत्सव के द्वितीय दिवस के कार्यक्रम का शुभारंभ युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ हुआ। तेरापंथी सभा बोरावड़ के मंत्री गजेन्द्र बोथरा व नताशा बेताला ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। बोरावड़ की बहन बेटियों ने गीत का संगान किया। पूज्य प्रवर ने उन्हें मंगल प्रेरणा दी व मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। मुख्य मुनि महावीर कुमार जी ने वर्धमान महोत्सव के द्वितीय और मध्य दिवस पर अपनी अभिव्यक्ति देते हुए कहा कि आरोग्य, बोधि और समाधि ये तीन ऐसे तत्त्व हैं जो व्यक्ति को सिद्धावस्था तक पहुंचा सकते है। साधना के क्षेत्र में आरोग्य - शारीरिक और मानसिक स्वस्थता आवश्यक होती है। बोधि अर्थात् व्यक्ति सम्यक् ज्ञान और सम्यक् दर्शन संपन्न बने और उसे चारित्र की प्राप्ति हो जाए। समाधि अर्थात् चित्त की स्वस्थता, समाधान। जब व्यक्ति को ये तीनों सूत्र प्राप्त हो जाते हैं तो उसकी गुणात्मकता प्रवर्धमान हो सकती है और एक दिन वह मोक्ष प्राप्त कर सकता है।
महातपस्वी शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने समुपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को पावन पाथेय प्रदान करते हुए फरमाया कि आज वर्धमान महोत्सव का दूसरा और मध्यवर्ती दिवस है। जब तक क्षीण मोह यथाख्यात चारित्र की प्राप्ति न हो जाए, हम ज्ञान और दर्शन में वर्धमान रहें और चारित्र में भी वर्धमान रहें। चारित्र के पांच प्रकार बताए गए हैं - सामायिक, छेदोपस्थानीय, परिहार विशुद्धि, सूक्ष्म संपराय, और यथाख्यात चारित्र। इन पांचों में सर्वश्रेष्ठ चारित्र यथाख्यात चारित्र होता है। यथाख्यात
चारित्र दो प्रकार का हो सकता है - 1. क्षीणमोह यथाख्यात चारित्र और 2. उपशांत मोह यथाख्यात चारित्र। उपशांत मोह यथाख्यात चारित्र ग्यारहवें गुणस्थान में और क्षीणमोह यथाख्यात चारित्र बारहवें, तेरहवें, और चौदहवें गुणस्थान में होता है। वर्तमान में इस भारत क्षेत्र में सामायिक और छेदोपस्थानीय ये दो ही चारित्र हो सकते हैं, इनकी भी निर्मलता, उज्जवलता अच्छी रहनी चाहिए।
चारित्र के अन्तर्गत तप को भी जोड़ा जा सकता है। संवर और तप दोनों से चारित्र पुष्ट हो सकता है। तपस्या के द्वारा कर्म निर्जरा होती है। निर्जरा के बारह भेदों में एक है - वैयावृतां अर्थात् सेवा। बीमार, अक्षम, या सेवा सापेक्ष की सेवा करना भी बहुत बड़ा तप है। सेवा करने वाले सेवा भी करते हैं और तपस्या में भी लगे रहते हैं। हमारे धर्मसंघ के साधु-साध्वी, समणियां, और मुमुक्षु भी जहां भी सेवा की अपेक्षा होती है, वहां जाने के लिए तत्पर और तैयार रहते हैं। सेवा शारीरिक भी हो सकती है और मानसिक भी हो सकती है। परिचर्या के रूप में भी सेवा होती है। सेवा धर्म भी बहुत आवश्यक होता है।
शास्त्र में कहा गया है कि वैयावृत्य से तीर्थंकर नाम गोत्र का भी बंध हो सकता है। सेवा धर्म योगियों के लिए भी आगम्य है। चारित्र की अच्छी निर्मलता रहे। पांच महाव्रत, पांच समिति, और तीन गुप्ति ये साधना के तेरह अंग हैं, इनके प्रति जागरूकता बनी रहे। सेवा-समर्पण के भाव बने रहें। जहां भी अपेक्षा हो वहां जाने और सेवा करने का मनोभाव बना रहे। आचार्य प्रवर के मंगल प्रवचन ने उपरान्त साध्वी वृंद ने गीत का संगान किया। पूज्य प्रवर की मंगल सन्निधि में दिवंगत साध्वी मनुयशाजी की स्मृति समा का अयोजन हुआ। आचार्य श्री ने उनका संक्षिप्त परिचय प्रदान करते हुए उनकी आत्मा के ऊर्ध्वारोहण की मंगलकामना की। चतुर्विध धर्मसंघ ने चार लोगरस का ध्यान किया। उनके संदर्भ में ही मुख्य मुनि, साध्वी प्रमुखा श्री ने भी श्रद्धाभिव्यक्ति देते हुए उनकी आत्मा के प्रति मंगलकामना की। साध्वी श्री के संसार पक्ष की ओर से अंजलि ने अभिव्यक्ति दी व परिवार के सदस्यों ने गीत का संगान किया।
तेरापंथ युवक परिषद् के अध्यक्ष अमित भंडारी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। तेरापंथ कन्या मंडल ने अपनी प्रस्तुति दी। अखिल भारतीय महेश्वरी सेवा सदन के महामंत्री रमेशचन्द्र छापरवाल ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। हेमा गेलड़ा के ग्रुप ने गीत की व ज्ञानशाला की प्रशिक्षिकाओं ने अपनी प्रस्तुति दी। राजकीय पी एम श्री विद्यालय के प्रधानाचार्य मनीष पारीक ने भी आचार्य प्रवर के स्वागत में अपनी अभिव्यक्ति दी।