तेरापंथ की पहचान है एक आचार और एक विधान : आचार्यश्री महाश्रमण

संस्थाएं

बोरावड़। 17 जनवरी 2026

तेरापंथ की पहचान है एक आचार और एक विधान : आचार्यश्री महाश्रमण

वर्धमान महोत्सव के अंतिम दिवस के मुख्य कार्यक्रम का शुभारंभ बोरावड़ की धरती पर ‘वर्धमान समवसरण’ में तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंगल महामंत्रोच्चार से हुआ। संसार पक्ष में बोरावड़ से संबद्ध साध्वी मृदुलयशाजी ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी, गुरुकुलवासी मुनिवृंद ने गीत का संगान किया।
वर्धमान महोत्सव के अंतिम दिवस पर साध्वी प्रमुखा विश्रुत विभाजी ने समुपस्थित जनता को उद्बोधन देते हुए कहा कि तेरापंथ धर्मसंघ अपनी उद्भव कालीन स्थिति से लगातार वर्धमान हो रहा है और आज इसका रूप उस समय से बिल्कुल अलग है। इस वर्धमानता का रहस्य है आचार्य भिक्षु का विजन और वह विजन है - एक आचार, एक विचार, और एक आचार्य। तेरापंथ धर्मसंघ के प्रत्येक साधु साध्वी का एक आचार है। पूरे धर्म संघ की तत्त्व संबंधी प्ररूपणा एक है कोई भी संघीय परंपरा के विपरित बात नहीं कर सकता। तीसरा और महत्त्वपूर्ण पक्ष है एक आचार्य की व्यवस्था। इस धर्मसंघ में आचार्य सर्वोपरि है फिर भी आन्तरिक लोकतंत्र है। एकतंत्र और लोकतंत्र का यह संतुलन ही तेरापंथ धर्म संघ को उत्कृष्ट बनाता है।
वर्धमान महोत्सव के शिखर दिवस पर शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी पावन संबोध प्रदान करते हुए फरमाया कि आज वर्धमान महोत्सव का तीसरा दिन है और चतुर्दशी तिथि भी है। चतुर्दशी का दिन हाजरी के रूप में प्रतिष्ठापित है। हाजरी का प्रथम वाक्य है - 'सर्व साधु-साध्वियां पांच महाव्रत, पांच समिति, और तीन गुप्ति की अखण्ड आराधना करें।' यह एक वाक्य साधुत्व को अपने आप में समेटे हुए हैं। इसका यदि अच्छी तरह पालन हो रहा है तो साधुत्व पुष्ट रहता है, साधुपन सुरक्षित रहता है। साधु जीवन में चित्त समाधि रहे और अपने ज्ञान आचार, दर्शन आचार, चारित्र आचार, तप आचार और वीर्य आचार - इस आचार पंचक के प्रति निष्ठा और सजगता रहे तो सहजानन्द की स्थिति बन सकती है।
संगठन की अपनी व्यवस्थाएं होती है। संगठन व संप्रदाय भी हमारी साधना में सहयोगी बनता है। संगठन है तो उसकी अपनी सांगठनिक मर्यादाएं भी अपेक्षित होती है। एक ओर आचार और दूसरी ओर विचार की भी बात होती है। त्याग धर्म-भोग अधर्म, व्रत धर्म- अव्रत अधर्म, आज्ञा धर्म- अनाज्ञा अधर्म, असंयति के जीने की वांछा करना राग, मरने की वांछा करना द्वेष और संसार समुद्र से तरने की वांछा करना वीतराग देव का धर्म है। अतः आचार पक्ष, विचार पक्ष, और तीसरा पक्ष है - सांगठनिक मर्यादा पक्ष। संगठन को व्यवस्थित और संगठित रखने के लिए मर्यादाएं बहुत उपयोगी होती है। एक मर्यादा है कि सर्व साधु-साध्वियां एक आचार्य की आज्ञा में रहें। विहार चातुर्मास आचार्य की आज्ञा से करें। अपना-अपना शिष्य-शिष्याएं न बनाएं। आचार्य भी योग्य व्यक्ति को दीक्षित करें और दीक्षित करने के बाद भी कोई अयोग्य निकले तो उसे गण से अलग कर दें। आचार्य अपने गुरुभाई या शिष्य को अपना उत्तराधिकारी चुनें, उसे सर्व साधु-साध्वियां सहर्ष स्वीकार करें।
ये मर्यादाएं तेरापंथ संगठन की पिलर्स हैं। इनमें भी सर्वश्रेष्ठ मर्यादा है सर्व साधु-साध्वियां एक आचार्य की आज्ञा में रहें। साधु जीवन को प्राप्त कर लेना बहुत बड़ी उपलब्धि होती है। इस जीवन में– चित्त में समाधि, शांति रहे और परस्पर अच्छा व्यवहार रहे। चतुर्विद्य धर्मसंघ ने आचार्यश्री के मुखारविंद के लुंचन की निर्जरा के संदर्भ में वंदना करते हुए निर्जरा में सहभागी बनाने की प्रार्थना की तो साधु, साध्वियों व समणियों के लिए आधा-आधा घंटा आगम स्वाध्याय तथा मुमुक्षु व श्रावक-श्राविकाओं के लिए तीन-तीन अतिरिक्त सामायिक करने की प्रेरणा दी। हाजरी के संदर्भ में साधु-साध्वियों व समणियों ने पंक्तिबद्ध खड़े होकर आचार्य प्रवर के समक्ष लेख-पत्र का उच्चारण किया।
बोरावड़ तेरापंथी सभा के अध्यक्ष नेमीचंद गेलड़ा ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। स्थानीय तेरापंथी सभा व तेयुप ने सामूहिक गीत का संगान किया। तेरापंथ किशोर मंडल के संयोजक गौरव बोथरा, चैनरूप बोथरा, विवेक गेलड़ा ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। कमल छाजेड़ ने गीत का संगान किया। पार्षद गजेन्द्र बोथरा, नागौर देहात, भाजपा जिलाध्यक्ष श्रीमती सुनिता रांझण, रवि छाजेड़ ने अपनी अभिव्यक्ति दी। तेरापंथ महिला मंडल ने अणुव्रत के संकल्पों का पत्र आचार्य प्रवर के चरणों में समर्पित किया।