मर्यादा और एकजुटता ही तेरापंथ धर्मसंघ की शक्ति

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गंगाशहर।

मर्यादा और एकजुटता ही तेरापंथ धर्मसंघ की शक्ति

आचार्य श्री महाश्रमण जी के आज्ञानुवर्ती, उग्र विहारी तपोमूर्ति मुनि कमल कुमार जी स्वामी ने तेरापंथ भवन, गंगाशहर में आयोजित सभा में श्रद्धालुओं को संबोधित किया। मुनिश्री ने तेरापंथ धर्मसंघ के आद्य प्रवर्तक आचार्य भिक्षु के योगदान को रेखांकित करते हुए उन्हें 'मर्यादा पुरुष' की संज्ञा दी। उन्होंने कहा कि आचार्य भिक्षु ने भगवान महावीर के सिद्धांतों का गहन अध्ययन कर उनका शुद्ध और सरल स्वरूप जनता के समक्ष रखा। मुनिश्री ने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में कहा कि हर महापुरुष के नए विचारों का प्रारंभ में विरोध होता है क्योंकि जनता उनसे अपरिचित होती है, लेकिन जैसे-जैसे दर्शन समझ में आता है, वही समाज उनका अनुयायी बन जाता है। आचार्य भिक्षु का मूल लक्ष्य स्वयं का आत्मोद्धार था, लेकिन उन्होंने जनोद्धार को भी उतना ही महत्वपूर्ण माना। उन्होंने साधु-साध्वियों के लिए कठोर मर्यादाओं का निर्माण किया, जो आज भी इस धर्मसंघ की एकजुटता का आधार हैं।
मर्यादा पत्र : एकजुटता का मूल मंत्र - मुनिश्री ने तेरापंथ की अनुशासित व्यवस्था पर प्रकाश डालते हुए बताया कि आचार्य भिक्षु ने साधु-साध्वियों के लिए हाजिरी (मर्यादा पत्र) के वाचन की परंपरा शुरू की थी। कालांतर में चतुर्थ आचार्य जीतमल जी (जयाचार्य) ने इसे सप्ताह में दो बार किया और नवम आचार्य श्री तुलसी ने महीने में दो बार हाजिरी के वाचन को अनिवार्य बनाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि तेरापंथ की चिरजीविता का राज इसकी 'एकता' में है—एक आचार्य, एक आचार, एक विचार और एक समाचारी। आचार्य भिक्षु ने व्यक्तिगत शिष्य प्रथा को समाप्त कर संघ को एक सूत्र में पिरोया, जो आज अन्य धर्मसंघों के लिए भी अनुकरणीय है।