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संविधान का सम्मान मानवता का मान
भारत जैसा गौरवशाली एवं विशाल लोकतांत्रिक राष्ट्र जिसका राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस 26 जनवरी जिस हर्ष उल्लास को लिए हुए आता है। लेकिन आजादी से पूर्व का भारत और वर्तमान स्थितियों पर चिंतन की अपेक्षा सतत रही है। जिस भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता रहा है। इसकी भौगोलिक और सामाजिक स्थितियों पर चिन्तन करने पर ज्ञात होता है कि आज की दशा किस रूप में है। कहा जा सकता भारत समस्याओं से ग्रस्त है। कितनी प्रकार की समस्याएं भारत में उत्पन्न हो रही है। फैशन, व्यसन, वैभव, विलासिता, अश्लीलता, आरोप, प्रत्यारोप जैसे न जाने कितनी कितनी परिस्थितियों से गुजरता हुआ भारत शिशक रहा है। स्वतंत्रता के पश्चात् जिस भारत में राम राज्य की कल्पना की जा रही थी। वह कल्पना अब राम राज्य के विपरीत नजर आ रही है।
ऐसा लगता है जब बाड़ ही खेत को खाने को आतुर है फिर फसल की सुरक्षा कैसे हो सकती है जिस घर का मालिक ही वफादार नहीं है उस घर को बिखरने से कौन बचा सकता है। विघटनकारी असामाजिक तत्वों के बढ़ने से आज भारत असुरक्षित हो रहा है। संविधान की धज्जियां सरेआम उड़ रही है। राजनेता, समाज नेताओं के साथ जब तक आम जनता में संविधान के प्रति एक सम्मानजनक भाव पैदा नहीं होता है तब ये पर्व मनाना औपचारिक ही हैं। चाहे 26 जनवरी हो या 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस हो या गणतंत्र दिवस- जब इस राष्ट्रीय पर्व का दिन आता है बड़े धूमधाम और जयकारों नारों से धरती आसमान को गुंजायमान कर देते है। और पर्व को इति श्री कहते हुए अलविदा कह देते है।
आज राष्ट्र के नेताओं में जो परदोष दृष्टि का भाव पैदा हो रहा है उसमें एक दूसरे के प्रति संदेह, निरपेक्षमनः स्थिति सहयोग का अभाव, स्वार्थ सिद्धि की प्रधानता, संविधान के प्रति उपेक्षा का भाव, कर्तव्य निष्ठा का अभाव, असहिष्णुता, स्वच्छन्दमनः मनोवृति, अनुशासनहीनता, सता की लोलुपता, झूठे आरोप प्रत्यारोप, येन केन प्रकारेण प्रसिद्धि की लालसा, स्वार्थभाव की प्रधानता ये ऐसे अनेक कारण है जो राष्ट्र को ऊंचा उठने में बाधक बन रहे है। भारत की स्वतंत्रता के अवसर पर आचार्यश्री तुलसी ने अणुव्रत जैसे नैतिकता, चारित्र प्रधान आंदोलन का प्रांरभ किया था। जो व्यक्ति जीवन में अणुव्रत आचार संहिता को स्वीकार कर लें तो भारत का मानव जाति के हित वरदान में साबित हो सकता है। जिससे सामाजिक और राष्ट्रीय भावना पुष्ट होती है। आज अपेक्षा है भारत का प्रत्येक नागरिक संविधान के प्रति सम्मान प्रदर्शित करें। भारत के भविष्य को अंधकार में गिरते हुए बचाए तथा पुनः उसे सोने की चिड़िया का सम्मान प्राप्त हो और यह तब संभव है जब के प्रत्येक नागरिक चाहे वह जैन हो सनातनी हो, हिन्दु हो, ईसाई हो. मुस्लिम हो चाहे किसी भी धर्म का अनुयायी हो, किसी भी परिवेश में जी रहा हो बस सबके दिलों में संविधान की आत्मा बोले। तब ही बनेगा मेरा भारत महान्। मैं भारतीय हूं। भारतीयता की सुरक्षा मेरा पहला कार्य होगा। तभी स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस सब प्रेम से मनाएंगें। जातिगत, सम्प्रदायगत, भेदों से उपरत होकर ही राष्ट्र की सुरक्षा कर सकेंगें।