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मेरी सहदीक्षिता साध्वी मनुयशा
जाए सहाए निरवंतो तमेव अणुपालेज्जा' आगम सूत्र को आत्मसात करनेवालों की श्रेणी में अपना नाम अंकित कर साध्वी मनुयशा जी अलविदा हो गई। मेवाड़ की लाडली होने से मेवाड़ी विरांगना का शौर्य उनके रग-रग में प्राणवान था। वो सहज, निस्पृह, फक्कड स्वभाव की साध्वी थी। संघ और संधपति के प्रति उनकी इस्पाती आस्था थी।
इसी दिव्य आस्था के बदौलत उन्होंने जीवन की हर कसौटी पर अपने को सफल साबित किया। अत्तकड़ा वेयणा वेदना आत्मकृत है। भगवती सूत्र के इस आर्षवचन को आत्मसात कर हंसते-हंसते शारीरिक वेदना को भोगा। फौलादी मनोबल का परिचय देते हुए युवावस्था में आई वेदना को उन्होंने समभाव से सहन किया। देहिक कष्ट में कभी कायर नहीं बनी। उनकी सहिष्णुता को देखकर मुझे स्वर्गीय साध्वी विशुद्ध प्रभाजी की स्मृति हो जाती। वो मेरी समणश्रेणी की सह दीक्षिता थी।
उन्होंने भी असाध्य बीमारी में विशेष उपचार न करवाते हुए समभाव से वेदना को भोगा। ऐसी सहिष्णुता का परिचय देने वालों पर हमें सात्विक गर्व होता है। उनकी व्यवस्थित दिनचर्या और साफ-सुथरा सुव्यवस्थित रहन-सहन अपने आपमें प्रेरणादायी था। वो मेरी श्रेणी आरोहण सहदीक्षिता थी। जब कभी विचारों का आदान-प्रदान होता तब वो यही कहती गुरुदेव की कृपा से मेरे पूर्ण समाधि है। सेवादायी सभी साध्वीया हर अपेक्षा की पूर्ति करती है। उनके पास बैठकर मुझे अपनेपन की अनुभूति होती थी। अपना हाथ जगन्नाथ' का आदर्श सबल अवस्था में साकार करने वाली मंजु ने जन्म तो शायद सबकी तरह ही लिया पर बचपन में ही वैराग्य के रंग से स्वयं को ओत-प्रोत कर मृत्यु को विशेष बना दिया।
उन्होंने देह की नहीं आत्मा की परवाह की। जब आखिर दिन शरीर की वेदना उग्रबनी तब भी उन्होंने यही कहा-मुझे हॉस्पिटल नहीं ले जाना। प्रोढ अवस्था में मरणभय से मुक्त उनकी चेतना सहजावस्था में रमण कर रही थी। खैर, किसी का भी जीवन एक अनमोल घरा है जिसे किसी आलेख में सीमित नहीं किया जा सकता। दिवंगत आत्मा के उध्र्वारोहण की मंगल कामना। उनके जीवन से कवि की ये पंक्तियां प्राणवान बनी। जिंदगी अपने बलपर जीती जाती है। दूसरों के कंधों पर तो केवल अर्थी जाती है।