सर्वज्येष्ठ भ्राता : सुजानमलजी दूगड़

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साध्वी सुमतिप्रभा

सर्वज्येष्ठ भ्राता : सुजानमलजी दूगड़

हुकमचन्द जी भुमरमल जी दूगड़ परिवार की कमान को थामने वाले सुजानमल दूगड़।
आचार्यश्री महाप्रज्ञजी द्वारा प्रदत शासनसेवी अलंकरण से अलंकृत सुजानमल दूगड़।
आचार्यश्री महाश्रमणजी के सर्वज्येष्ठ भ्राता सुजानमलजी दूगड़
बालक मोहन की दीक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले- सुजानमल दूगड़।
आदेय वचन और प्रबल पुण्याई के धनी सुजानमल दूगड़।
मर्यादा और अनुशासन के सजग प्रहरी- सुजानमल दूगड़।
सरदारशहर के प्रतिष्ठित श्राावक – सुजानमल दूगड़।

मैने सुजानमलजी के जीवन को गहराई से देखने का प्रयत्न किया, तब मुझे लगा कि परम पूज्य आचार्यश्री महाश्रमणजी और सुजानमल जी की कार्यशैली और चिन्तन शैली में काफी समानताएं हैं-
1. जैसे आचार्यश्री महाश्रमणजी तेरापंथ धर्मसंघ के सर्वोच्च व्यक्ति हैं, वैसे ही सुजानमल पूरे दुगड़ परिवार के सर्वोच्च व्यक्ति थे।
2. जैसे आचार्य प्रवर धर्मसंघ के हर सदस्य के लिए आधार स्तम्भ मेढ़ीभूत और ढाल हैं वैसे ही दूगड़ परिवार के हर सदस्य के लिए सुजानमल जी आधार स्तम्भ, मेढ़ीभूत और ढाल थे।
3. जैसे आचार्यप्रवर की स्मरण-शक्ति की कोई मिसाल नहीं है, वैसे ही सुजानमल जी की स्मृति भी बहुत अच्छी थी।
4. जैसे आचार्यवर के मन में अपनी संसार पक्षीया मां के प्रति विशेष अहोभाव है, वैसे ही मैने देखा सुजानमल जी के मन में भी मां के प्रति विशेष सम्मान और समर्पण का भाव था।
5. जैसे आचार्यप्रवर दूसरों के हित के लिए अपने हित का भी विसर्जन कर देते हैं, वैसे ही सुजानमल जी को भी मैंने परहित के लिए स्वहित का विसर्जन करते देखा है।
6. जैसे आचार्यप्रवर छोटी से छोटी व्यवस्थाओं आदि की बात भी लिखित करवाते हैं, वैसे ही सुजानमलजी का भी लिखित बात में अधिक विश्वास था।
7. जैसे आचार्य प्रवर के जीवन में तीसरे दशक में एक नया मोड़ आया और संघ की अन्तरंग व्यवस्थाओं से जुड़ गए, वैसे ही सुजानमल जी के जीवन में भी तीसरे दशक में एक नया मोड़ आया और दूसरे दूगड़ परिवार की जिम्मेदारियां उनके कंधों पर आ गई।
8. जैसे आचार्यप्रवर महाश्रमिक हैं, वैसे ही सुजानमल जी भी बहुत श्रमशील थे।
9. जैसे आचार्यप्रवर विहारों के दौरान कुछ किलोमीटर का चक्कर लेकर भी श्रद्धा के क्षेत्रों में पधारने का प्रयास करते हैं, वैसे ही सुजानमलजी भी हर परिचित व्यक्ति के स्थान पर जाकर मिलने का प्रयत्न करते थे।
10. जैसे आचार्यप्रवर का जीवन संघ, समाज और देश की सेवा के लिए समर्पित है, वैसे ही सुजानमलजी ने भी जीवन अपना पूरा परिवार की सेवा में लगा दिया और यथोचित समाज सेवा भी की ।
11. जैसे आचार्यवर किसी बात को कहानियों के माध्यम से सरलता से समझा देते हैं, वैसे ही मैने देखा कि सुजानमलजी भी कहानियों के माध्यम से बात समझाया करते थे।
12. जैसे आचार्यप्रवर वचन के पक्के और समय के पाबन्द हैं, वैसे ही सुजानमलजी भी अपने वचन के पक्के और समय के पाबन्द थे। मैने देखा, घर में जब शादी का प्रसंग होता तो वे बरात प्रस्थान का जो समय निर्धरित कर देते, उसमें फिर एक दो मिनिट की भी देरी नहीं करतें अपने निकटतम ज्ञातिजनों का भी इन्तजार नहीं करते।
13. जैसे आचार्यप्रवर अनेकों बार अपने पूर्वजों यानी आचार्य तुलसी और आचार्य महाप्रज्ञजी के संस्मरण सुनाते हुए नहीं थकते हैं, वैसे ही सुजानमल जी भी अपने पूर्वजों यानी हुकमचन्द जी और कुमरमल जी के घटना प्रसंग सुनाते हुए नहीं थकते थे।
14. जैसे तेरापंथ का हर सदस्य आचार्यप्रवर से पूछे बिना कोई काम नहीं करता, वैसे ही दूगड़ परिवार का हर सदस्य सुजानमलजी को पूछे बिना कोई काम नही करता था।
15. जैसे आचार्यप्रवर का हौसला बुलन्द है, साहस कूट-कूटकर भरा है, परिस्थिति के सामने कभी झुकते नहीं हैं और कर्मो के सिवाय किसी से डरते नही हैं। मैने देखा,
16. जैसे आचार्यवर की प्रमाणिकता के प्रति गहरी निष्ठा है और लोगों को भी प्रामाणिक रहने की प्रेरणा दिराते हैं, वैसे ही सुजानमल जी के जीवन में भी प्रामाणिकता बोलती थी वे भी अपने परिवार को प्रामाणिक रहने की प्रेरणा देते थे।
17. जैसे आचार्यवर संघीय पुरानी धारणाओं के जानकार हैं वैसे ही सुजानमल जी भी परिवारिक पुराने रीति रिवाजों के जानकार थे।
18. जैसे आचार्यप्रवर के मन में अपने पराए का कोई फर्क नहीं है। हमने कभी नही देखा कि आचार्यवर अपनी सेवा में नियुक्त सन्तों का या निकट रहने वाले सन्तों का या ज्ञाति साध्वियों का अतिरिक्त ध्यान रखाते हैं। उनके लिए सब समान हैं। वैसे ही सुजानमल जी के मन में भी अपने बच्चों के प्रति और अपने भाई-बहनों व उनके बच्चों के प्रति कोई फर्क नहीं था। वे सबको एक नजर से देखते थे।
शासनमाता साध्वी प्रमुखाश्री कनकप्रभाजी के शब्दों में जिस व्यक्ति के जीवन में संयम और सादगी के संस्कार रचे बसे हों जो नाम पद और प्रतिष्ठा की भावना से दूर हो, जो अपने सिद्वान्तों के प्रति अडिग हो, जिसकी श्रमनिष्ठा बेजोड़ हो, जो स्वार्थ चेतना से उपर उठकर कर्तव्य परायण बुद्धि से परिवार का योगक्षेम करने के लिए तत्पर हो, और जो धर्मसंघ में सर्वोच्च पद पर प्रतिष्ठित महान व्यक्तित्व का सहोदर होने पर भी निरभिमानी हो। इन सभी विशेषताओं का समवाय है- सुजानमल जी दूगड़ (सरदारशहर) का जीवन।