संघ और संगठन का होता रहे  विकास : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

छोटी खाटू। 25 जनवरी 2026

संघ और संगठन का होता रहे विकास : आचार्यश्री महाश्रमण

माघ शुक्ला सप्तमी।
राजस्थान के छोटी खाटू नगर में जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के महाकुम्भ- १६२ वें मर्यादा महोत्सव के त्रिदिसवसीय समारोह का शिखर दिवस। मर्यादा समवसरण में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। मुनि दिनेशकुमार जी ने जयघोष के साथ मर्यादा गीत का संगान किया। तदुपरांत समणीवृंद, साध्वीवृंद व संतवृंद पृथक-पृथक गीत का संगान किया।
तत्पश्चात् साध्वीप्रमुखा विश्रुत विभाजी ने समुपस्थित जनता को उद्बोधन प्रदान करते हुए कहा कि तेरापंथ धर्मसंघ के ऊध्वारोहण का प्राणतत्व है- मर्यादा। सामान्यतया मर्यादा को बंधन कहा जाता है परन्तु वस्तुतः यह हमारे जीवन विकास के लिए आवश्यक घटक तत्त्व है। मर्यादा हमारे जीवन का सुरक्षा कवच है। आचार्य भिक्षु ने मर्यादाओं का निर्माण किया। उन्होंने संघ की एकता, अखंडता और पवित्रता बनाए रखने के लिए मर्यादाएं बनाई थी। आचार्य भिक्षु अर्न्तदर्शन संपन्न थे और भविष्य दृष्टा थे। तेरापंथ धर्मसंघ आज्ञा निष्ठ, मर्यादा निष्ठ, प्रशासन निष्ठ, समर्पण निष्ठ धर्मसंघ है, इस धर्मसंघ में हम सब आनंद की अनुभूति कर रहे हैं। परम पूज्य गुरुदेव की सेवा में रहते हुए विकास के शिखरों तक पहुंचने का प्रयत्न करें।
साध्वीप्रमुखाश्री के उद्बोधन के पश्चात् तेरापंथ धर्मसंघ के शिखर पुरूष, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि हमारे जीवन में अनुशासन का बहुत महत्व होता है। व्यक्तिगत जीवन में और संगठन में भी अनुशासन की आवश्यकता होती है। दुनिया में राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक- आध्यात्मिक आदि संगठन मिलते हैं। आज हम जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के 162वें मर्यादा महोत्सव के आयोजन को मनाने के लिए यहां उपस्थित हैं।
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ जैन शासन की ही एक शाखा है। यह मुख्यतया एक धार्मिक आध्यात्मिक संगठन है, नितान्त सामाजिक संगठन नहीं है। इस संगठन की अपनी मर्यादा, व्यवस्थाएं हैं और मर्यादाओं के संदर्भ में व्यवस्थाओं के आलोक में आज का यह आयोजन हो रहा है। इसके आयोजन के प्रारंभ को 161 वर्ष बीत गए हैं और यह 162 वां आयोजन है। परम पूज्य प्रज्ञा पुरुष श्रीमद्जयाचार्य ने यह समारोह शुरू किया था। किन्तु इस आयोजन का आधार यह मर्यादा पत्र है जो आचार्य भिक्षु से संदर्भित है। इस पन्ने पर जो लिखत है उस पर माघ शुक्ला सप्तमी तिथि उल्लिखित है। इस मर्यादा पत्र पर लिखी हुई मर्यादाओं से संबद्ध यह आयोजन है। तेरापंथ धर्मसंघ के प्रथम आचार्य, आचार्यश्री भिक्षु स्वामी हुए। उन्होंने एक आचार्य की परंपरा का विधान किया। उसके अनन्तर आचार्य परंपरा चली। वर्तमान में भी हमारा धर्मसंघ गतिमान है। इस मर्यादा पत्र में संगठन की दृष्टि से कई बातें उल्लिखित हैं।
आचार्यश्री ने मर्यादाओं का वाचन कर उनका विवेचन किया और चारित्रात्माओं को उन मर्यादाओं का त्याग और पचखाण कराया। आचार्यप्रवर ने आगे कहा कि हमारा धर्मसंघ अध्यात्म आधारित है और अध्यात्म में मूल तत्व आत्मा है। इसलिए चारित्रात्माओं में आत्मनिष्ठा का भाव होना चाहिए कि हमने आत्मोदय के लिए यह साधुपन लिया है। हम आत्मवाद को मानकर, उसके प्रति निष्ठा रखते हुए आगे बढ़ें। साधना की दृष्टि से यह संघ हमारा घर है अतः अपनी क्षमतानुसार मैं इस संघ की सेवा करूं। जहां तक संभव हो अपने साधुपन को अच्छा रखते हुए, दूसरों की सेवा का प्रयास हो। सबके प्रति शिष्टाचार व सद्भावना रखने का प्रयास करना चाहिए। आज्ञा और आचार के प्रति निष्ठा का भाव हो। पांच महाव्रत, पांच समिति और तीन गुप्ति की अखण्ड आराधना का प्रयास हो। जहां भी रहें अपनी गलतियों को आलोयणा ले लेनी चाहिए। हमें यह जो चारित्र रूपी हीरा प्राप्त है, उसकी सुरक्षा के प्रति जागरूक रहें।
हमारे धर्मसंघ में मर्यादाओं के पालन में बहुत अच्छी जागरूकता है। श्रावक समाज के लिए भी श्रावक संदेशिका बनी हुई है, जिसमें श्रावकों से सम्बन्धित नियमावली है। इसमें श्रावक जीवन के व्यक्तिगत जीवन में की जाने वाली साधना तथा संस्थाओं आदि के संदर्भ में नियम है, इससे काफी प्रश्नों का समाधान प्राप्त हो सकता है। एक आचार, एक विचार, एक आचार्य, एक विधान और गुरु- ये पांच बातें एकता के सूत्र है। संगठन निर्मल रहे, संघ का विकास होता रहे, संघ का भविष्य अच्छा रहे। जहां तक संभव हो, संघ की यथायोग्य सेवा करने का प्रयास हो।
जैन विश्व भारती में हमारा योगक्षेम वर्ष के संदर्भ में लम्बा प्रवास निर्धारित है। यह योगक्षेम वर्ष, विकास व प्रशिक्षण का सुअवसर है और इसका लाभ उठाने का प्रयास होना चाहिए। आचार्य प्रवर ने आज के दिन के लिए स्वरचित गीत का संगान किया। पूज्य प्रवर के साथ चतुर्विध धर्मसंघ ने भी गीत का संगान किया। आचार्य प्रवर ने आगे कहा कि लाडनूं प्रवास के बाद विहार करना है। सरदारशहर में एक महीने का प्रवास, व श्रीगंगानगर अंचलन की यात्रा आदि का वर्णन करते हुए श्रीगंगानगर अंचल के रायसिंहनगर में वर्ष 2027 की अक्षय तृतीया तथा जन्मोत्सव व पट्टोत्सव का आयोजन श्रीगंगानगर में करने की घोषणा की। साथ ही हनुमानगढ़ जिले में भी यात्रा के स्थानों की जानकारी दी। तदुपरान्त आचार्यश्री ने पंजाबवासियों पर कृपा बरसाते हुए वर्ष 2029 का चातुर्मास महाप्रज्ञ इंटरनेशनल स्कूल- फागला, लुधियाना में करने की घोषणा की। वर्ष 2029 का मर्यादा महोत्सव चंडीगढ़ में करने की घोषणा की, इसके उपरांत जम्मु व शिमला की भी यात्रा करने की घोषणा की। आचार्य प्रवर ने पंजाब के अनेक क्षेत्रों में भी पधारने की घोषणा कर पंजाब वासियों को भाव विभोर कर दिया।
पूज्य प्रवर ने मुमुक्षु दिव्या, मुमुक्षु कोमल को साध्वी प्रतिक्रमण सीखने की अनुमति प्रदान की। मुमुक्षु प्रिया को 6 मार्च को साध्वी दीक्षा, मुमुक्षु भावना को 20 सितंबर 2026 को समणी दीक्षा देने की घोषणा की। इसके साथ ही आचार्यश्री ने साधु-साध्वियों के विहार क्षेत्र व चातुर्मासिक क्षेत्रों की घोषणा की।तदुपरांत आचार्य प्रवर की मंगल सन्निधि में उपस्थित साधु, साध्वी व समणीवृंद पाण्डाल में पंक्तिबद्ध हुए और लेखपत्र का उच्चारण किया। आचार्य प्रवर की आज्ञा से श्रावक समाज खड़ा हुआ और पूज्य प्रवर ने श्रावक निष्ठा पत्र का वाचन कर संकल्पों को स्वीकार कराया। इस आयोजन में आचार्य प्रवर सहित 55 संत, 179 साध्वियां, 30 समणीवृंद व 33 मुमुक्षु उपस्थित रही। आचार्यश्री ने संघ गान के उपरांत 162वें मर्यादा महोत्सव की सुंसपभता की घोषणा की।