गुरुवाणी/ केन्द्र
आचार्य की आज्ञा और धर्म के प्रति रहें जागरूक : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के 162वें मर्यादा महोत्सव का आज द्वितीय एवं मध्यवर्ती दिवस। आज के कार्यक्रम का शुभारंभ जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ हुआ। सर्वप्रथम छोटी खाटू तेरापंथ समाज ने गीत का संगान किया। मर्यादा महोत्सव व्यवस्था समिति के महामंत्री श्री बच्छराज बेताला ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। तत्पश्चात मुमुक्षु बहिनों ने गीत का संगान किया।
तदुपरांत मुख्य मुनि महावीरकुमारजी ने समुपस्थित विशाल श्रद्धाुलओं के समूह को उद्बोधन प्रदान करते हुए कहा कि हम बहत सौभाग्यशाली हैं कि हमें मानव जीवन, जैन धर्म और भैक्षव शासन मिला है। यह छोटी खाटू की धरा पर हो रहा। 162वां मर्यादा महोत्सव अपने आप में विलक्षण हैं क्योंकि यह आचार्यश्री भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष के अंतर्गत आया है तथा योगक्षेम वर्ष की पूर्व भूमिका में यह महोत्सव आया है और छोटी खाटू की धरा पर पहली बार हो रहा है। यह वर्ष हम भिक्षु चेतना वर्ष के रूप में मना रहे हैं। आचार्य भिक्षु की चेतना एक पवित्र चेतना थी, उस पवित्रता को हम अपने भीतर जाग्रत करें तो, सही मायनों में यह भिक्षु चेतना वर्ष बन पाएगा। हमारे सम्मुख योगक्षेम वर्ष, इस योगक्षेम वर्ष में हम ऐसा प्राप्त करें, जिससे हम सब और हमारा धर्मसंघ अध्यात्म की दिशा में नए सोपनों को गढ़ें।
आज 162वें मर्यादा महोत्सव के दूसरे दिवस अर्थात माघ शुक्ला षष्ठी के दिन तेरापंथ धर्मसंघके दशमाधिशास्ता, प्रेक्षा प्रणेता आचार्यश्री महाप्रज्ञजी का पट्टोत्सव दिवस भी था। इस मंगल अवसर पर युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के 162वें मर्यादा महोत्सवके त्रिदिवसीय समारोह का आज मध्यवर्ती दिवस है। आज का दिन परम पूजनीय आचार्यश्री महाप्रज्ञजी के आचार्य पदाभिषेक का भी दिन है। आज के दिन हमारे धर्मसंघ में अपूर्व महोत्सव हुआ था। अपूर्व इसलिए कि इस महोत्सव में आचार्यश्री महाप्रज्ञजी का जो पट्टोत्सव हुआ उनमें उनके गुरू आचार्यश्री तुलसी ने पछेवड़ी की रस्म पूरी की। परम पूज्य आचार्यश्री महाप्रज्ञजी ऐसे पहले आचार्य थे। जो अपने गुरू की विद्यमानता में आचार्य बने। इसलिए आचार्यश्री महाप्रज्ञजी तेरापंथ धर्मसंघ के विलक्षण आचार्य बने। वैसे आचार्यश्री तुलसी भी विलक्षण आचार्य थे जिन्होंने आचार्य पद का परित्याग कर अपनी विद्यमानता में ही अपने युवाचार्य श्री महाप्रज्ञजी को आचार्य पद पर प्रतिष्ठित कर दिया। आज के ही दिन उनका आचार्य पदारोहण हुआ।
आचार्य प्रवर ने कहा कि तेरापंथ धर्मसंघ में सेवा की भावना बहुत अच्छी है। आचार्य की आराधना, गण की आराधना, संघ की आराधना, मर्यादाओं का पालन, संघ के प्रति अहोभाव रखने और उसके विकास में सहभागी बनने का प्रयास करना चाहिये। हम सभी आज्ञा, मर्यादा, आचार्य की आज्ञा और धर्म के प्रति जागरूक रहें। आज जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के वार्षिक अधिवेशन का दिन है। यह संस्था ‘संस्था शिरोमणी’ के रूप में प्रतिष्ठित है। माघ शुक्ला षष्ठी का दिन गुरूदेव तुलसी के समय से अधिवेशन का निर्धारित दिन चला आ रहा है। यह चुनाव का दिन भी है। तेरापंथी महासभा धर्मसंघ की धार्मिक आध्यात्मिक सेवा करती रहे।
ऐसी संस्था का अधिवेशन होने वाला है। महासभा द्वारा धार्मिक आध्यात्मिक सेवा व विकास का प्रयास होता रहे। आचार्य प्रवर की मंगल सन्निधि में आज विद्यार्थी भी उपस्थित थे। इस संदर्भ में आचार्य प्रवर ने विद्याथियों को सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति की प्रेरणा दी। विद्याथियों को इन तीनों प्रतिज्ञाओं का संकल्प करवाया। आचार्यश्री ने कहा कि महासभा की जगह-जगह स्कूल खोलने की योजना चल रही है। महासभा के शिक्षा के अभियान में शिक्षा के साथ-साथ अच्छे संस्कार की बात भी रहे, यह काम्य है। तत्पश्चात तेरापंथ विकास परिषद के सदस्य पदमचंद पटावरी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभ के अध्यक्ष श्री मनसुखलाल सेठिया, अभातेयुप के अध्यक्ष पवन मांडोत, अभा तेरांपथ महिला मंडल की अध्यक्षा सुमन नाहटा, तेरापंथ प्रोफेसनल फोरम के राष्ट्रीय अध्यक्ष हिम्मत मांडोत, अणुविभा के अध्यक्ष प्रतापसिंह दूगड़, जैन विश्व भारती के मंत्री सलिल लोढ़ा, जैन विश्व भारती इंस्टीट्यूट मान्य विश्वविद्यालय के कुलपति बच्छराज दूगड़, अखिल भारतीय अणुव्रत न्यास के अध्यक्ष श्री के.सी.जैन सभी ने अपनी संस्थाओं से संदर्भित अभिव्यक्तियां दी। जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के मुख्यन्यासी महेन्द्र नाहटा ने विशिष्ट दान-दाताओं के नामों की घोषणा की। दानदाताओं के परिवारों ने पूज्य-प्रवर के सम्मुख उपस्थित होकर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। अणुविभा द्वारा क्लास वन टू के लिये जीवन विज्ञान की पुस्तकों का आचार्य प्रवर के समक्ष लोकार्पण किया। महासभा के वार्षिक प्रतिवेदन को भी आचार्य प्रवर के समक्ष लोकार्पित किया गया।