गुरुवाणी/ केन्द्र
दुनिया में अभयदान है श्रेष्ठदान : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, शांतिदूत अखण्ड परिव्राजक, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आर्हत वाड्मय के माध्यम से अमृत देशना प्रदान करते हए कहा कि भय एक संज्ञा है, वृति है। मोहनीय कर्म का ही अंग भय संज्ञा है। भय की संज्ञा दुर्बलता पैदा करने वाली होती है।
आठ आत्माओं में एक मात्र कषाय आत्मा ऐसी है जो एकांत सावद्य है। एकांत अशुभ है जिनमें 16 प्रकृतियां- अनंतानुबंधी, अप्रत्याख्यानी, प्रत्याखानी, संज्जवलन चतुष्क (क्रोध, मान, माया, लोभ) की नौ कषाय और तीन दर्शन मोहनीय की होती है। मोहनीय कर्म के मूलतः दो विभाग है- दर्शन मोहनीय और चारित्र मोहनीय है। दर्शन मोहनीय के तीन प्रकार है- मिथ्यात्व और सम्यकत्व और मिश्र दर्शन मोहनीय होते है। शेष 25 भेद चारित्र मोहनीय के होते है।
हमारा सम्यकत्व दर्शन मोहनीय से संबद्ध है। दर्शन मोहनीय का क्षयोपशम, क्षय या उपशम है तो सम्यकत्व की प्राप्ति होती है।
भय चारित्र मोहनीय के परिवार के अंतर्गत है। यह भय संज्ञा आदमी और अन्य प्राणियों में कई प्रकार बार उभरती है और आदमी डरने लग जाता है। जैन वाड्मय में कहा गया- उन जिनों का तीर्थंकरों को नमस्कार है, जिन्होंने भय को जीत लिया है। सिद्ध भगवान के तो भय की कोई बात ही नहीं है, तीर्थंकर और केवली भगवान भी पूर्णतया अभय होते हैं। ग्यारहवें, बारहवें गुणस्थान वर्ती छद्मस्थ चारित्रात्माओं भी उपरी तौर पर भय से मुक्त होते हैं। ग्यारहवें गुण स्थान में भी भय उपशांत रूप में होता है, उदय रूप मे नहीं होता है।
10वें, 9वें, 8वें, 7वें गुणस्थान में भी योग्य रूप में भय नहीं होता। योग रूप में भय पहले से छठे गुणस्थान तक ही होता है। अतः छठे गुणस्थान तक प्राणी जिनमें मनुष्य और साधु सम्मिलित हैं, उनमें भय की संज्ञा को प्राप्त कर सकती है। अतः यदि यह संभव न हो सके तो किसी को डराना नहीं चाहिये। किसी में भय पैदा नहीं करना चाहिये। अभय के दो अर्थ हो सकते है- डरना नहीं और डराना नहीं। दोनों संदर्भों में भय को देख सकते हैं। हमारा जीवन अनित्य है अतः इस अनित्य जीवन लोक में हिंसा में आसक्त नहीं होना चाहिये। दूसरे प्राणियों को अभयदान का प्रयास करना चाहिये। दुनिया में अनेकदान हैं उनमें श्रेष्ठदान अभयदान देने को कहा गया है। छः काय के जीवों की हिंसा करने का त्याग कर देना उन जीवों के प्रति अभयदान हो जाता है। अतः मोहनीय कर्म के उदय से आदमी को भय लगने लगता है। ऐसी स्थिति में जप, ध्यान आदि का आलंबन लेना चाहिये। किसी नाम का स्मरण करके भी हम भय के स्थान पर अभय को स्थापित करने का प्रयास कर सकते हैं।
आज गणतंत्र दिवस है। भारत का 15 अगस्त 1947 को जो स्वतंत्रता प्राप्त हुई थी। स्वतंत्रता मिलना एक बात है। परंतु स्वतंत्रता का अच्छा उपयोग करना स्वतंत्रता को सुरक्षित रखना विशेष बात होती है। जहां संविधान का अच्छा उपयोग करना स्वतंत्रता को सुरक्षित रखना विशेष बात होती है। जहां संविधान का अच्छा पालन होता है और उसके प्रति जागरूकता होती है, यह अच्छी बात हो सकती है। कल हमने मर्यादा महोत्सव मनाया, मर्यादाओं के प्रति हमारे मन में जागरूकता और निष्ठा रहे, यह काम्य है।
मंगल प्रवचन के पश्चात मुनि तन्मय कुमारजी ने अपनी विचाराभिव्यक्ति दी। सिद्धार्थ यश कोचर, महेन्द्र कोचर, तेरापंथ महिला मंडल मंत्री पूजा सेठिया, नीलम सेठिया ने श्रद्धाभिव्यक्ति दी। ज्ञानशाला की प्रशिक्षिकाओं और ज्ञानर्थियों ने प्रस्तति दी।
इससे पूर्व पूज्य प्रवर को सन्निधि में पूर्व मुख्यमंत्री राजस्थान सरकार की वसुंधरा राजे दर्शनार्थ पहुंची इस अवसर पर पूज्य गुरूदेव से मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। एवं समसामायिक विषयों पर चर्चाकर मार्गदर्शन प्राप्त किया। छोटी खाटू मर्यादा महोत्सव व्यवस्था समिति के पदाधिकारियों द्वारा श्रीमती वसुंधरा राजे का साहित्य से सम्मान किया।