आदमी सम्यक ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करे :आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

छोटी-खाटू। 22 जनवरी 2026

आदमी सम्यक ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करे :आचार्यश्री महाश्रमण

मर्यादा महोत्सव से एक दिन पूर्व राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर संघ चालक मोहन भागवत, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी की सन्निधि में पहुंचे। मर्यादा समवसरण में शांति दूत आचार्यश्री महाश्रमण जी के पधारने के कुछ समय पश्चात् ही आर एस एस प्रमुख आचार्य प्रवर की मंगल सन्निधि में पहुंचे और आचार्यप्रवर को वंदन कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण जी के मंगल महामंत्रोच्चार के बाद जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के अध्यक्ष तथा मर्यादा महोत्सव व्यवस्था समिति छोटी खाटू के अध्यक्ष मनसुख लाल सेठिया ने सरसंघ चालक का वक्तव्य द्वारा स्वगात किया। युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने समुपस्थित श्रद्धालुओं को पावन संबोध प्रदान करते हुए कहा कि यह बहुत अच्छी बात है कि भारत में बहुत अच्छे ग्रंथ है। संस्कृत, प्राकृत, पालि और अन्य कई भाषाओं में अनेक ग्रंथ उपलब्ध है। इन ग्रंथों में संग्रहीत अच्छी वाणियां भी अपने आप में रत्न होती है।
संस्कृत में कहा गया है कि धरती पर तीन रत्न है- पानी, अनाज और सुभाषित अच्छी वाणी भी एक रत्न होती है। शास्त्रों की कल्याणी वाणी से हमें मार्गदर्शन प्राप्त हो सकता है। भारत का यह सौभाग्य है कि यहां की धरती पर अनेक संत हुए हैं और आज भी हैं। ऐसे ज्ञानी संतों के उपदेश सुनने को मिलें तो समय भी सार्थक हो सकता है और जीवन की दिशा भी अच्छी मिल सकती है।
शास्त्र में कहा गया है कि- ‘‘स्वयं सत्य खोजो।’’ आदमी सम्यक ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करे। अध्यात्म जगत में साधना द्वारा सच्चाई की शोध और सच्चाई की प्राप्ति हो सकती है। ज्ञान इंद्रियों की सहायता से भी हो सकता है दूसरा ज्ञान अतीन्द्रिय होता है, जो इन्द्रियों और मन की सहायता के बिना प्राप्त होता है। पहली प्रकार का ज्ञान परोक्ष और दूसरी प्रकार का ज्ञान प्रत्यक्ष ज्ञान होता है जो भीतर से प्रकट होता है। ज्ञान का हमारे जीवन में बहुत महत्व है ज्ञान एक पवित्र तत्त्व है और ज्ञान के साथ आदमी को आचरण भी अच्छा बनाना चाहिए।
हमारे धर्मसंघ के मर्यादा महोत्सव का त्रिदिवसीय समारोह वसंत पंचमी से शुरु होने वाला है। समारोह का मूल दिन माघ शुक्ला सप्तमी है। मर्यादा हमारे जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकती है। आदमी को अपने अनुशासन-मर्यादा में रहना चाहिए। राजतंत्र हो अथवा लोकतंत्र दोनों ही शासन प्रणालियों में अनुशासन। आवश्यक होता है। साधु का धर्म तो सहन करना होता है, लेकिन जहां देश की सुरक्षा की बात हेा तो कुछ कड़ाई अथवा कार्यवाही भी करनी पड़ सकती है। हालांकि उस कड़ाई में शांति की स्थापना भूल में होती है। आज मोहन जी भागवत का आना हुआ है। बहुत अच्छी बात है। यों चातुर्मास में उनका आना प्रायः होता है परन्तु आज अतिरिक्त आना हुआ है। आगे जैन विश्व भारती भी है।
आचार्य प्रवर के मंगल प्रवचन के उपरान्त राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंचालक श्री मोहन भागवत ने कहा कि परम श्रद्धेय आचार्य प्रवर! हम लोग जो लाठी चलाते हैं, वह क्यों चलाते हैं, इस बात का स्मरण रखने के लिए ही आप जैसे संतो के पास आता हूँ। आज मेरा एकस्ट्रा आना हुआ है तो यह मेरा एकस्ट्रा लाभ है। पुस्तकों में अनेक बातें लिखी होती है, लेकिन उनसे बात पूरी नहीं होती। उनको अपने आचरण से बताने का कार्य भारत करता है। धर्म के पीछे जो सत्य है, उसे हमारे पूर्वज जानते हैं, बाहर के देशों की मदद के लिए आगे बढ़ता है। व्यवहार का संतुलन और अनुशासन भारत जानता है। जीवन को अच्छा बनाने के लिए त्यागी संतों की सन्निधि में उपस्थित होना होता है। मेरा यहां बार-बार आने का एकमात्र कारण है कि आचार्य श्री की सन्निधि में पहुंच कर आंखे खुल जाती है। मैं पुनः आचार्य श्री जी वंदन करता हूं। मंगल प्रवचन कार्यक्रम के उपरान्त भागवत जी और आचार्यश्री विभिन्न विषयक वार्तालाप का क्रम हुआ।