मर्यादाओं के प्रति जागरूक रहने का प्रयास करना चाहिये :आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

छोटी-खाटू। 21 जनवरी 2026

मर्यादाओं के प्रति जागरूक रहने का प्रयास करना चाहिये :आचार्यश्री महाश्रमण

मर्यादाओं के प्रति जागरूक रहने का प्रयास करना चाहिये जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, शांतिदूत, आचार्यश्री महाश्रमणजी ने छोटी-खाटू प्रवास के द्वितीय दिवस अपनी अमृत देशना प्रदान करते हुए कहा कि जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ का मर्यादा महोत्सव निकट आ रहा है। अभी माघ महीने के शुक्ल पक्ष के पूर्ववर्ती दिन है। मर्यादाओं का सामुदायिक जीवन मे कुछ अतिरिक्त महत्व होता है, यद्यपि मर्यादा व्यक्तिगत जीवन में भी साधना के क्षेत्र में सहायक बन सकती है। राग-द्वेष नहीं करना मूल तत्व है, यदि मोक्ष का साध्य बनाया गया है। यदि मोक्ष को साधना है तो उसका साधन राग द्वेषात्मक नहीं बन सकता। साध्य के अनुरूप ही यदि साधन होता है तो वह साधन, साध्य से मिलन करा सकता है।
मोक्ष अपने आप में राग-द्वेष मुक्तता की स्थिति होती है, इसलिए इसकी साधना भी राग-द्वेष मुक्ति की होनी चाहिये। मोक्ष में अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन निरन्तरायता, आत्म-रमण की स्थिति है, अतः उसकी साधना भी सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन, सम्यक् चारित्र की, सम्यक् ज्ञान और तप की भी हो सकती है। कुछ नियम-व्यवस्थाएं मूल साधन नहीं पर वे सहायक की भूमिका अदा कर सकते हैं। कुछ मर्यादाएं सहायक बन सकती है। जैसे साधुओं की वर्तमान में आचार व्यवस्था में मुखवस्त्रिका, रजोहरण, प्रमार्जनी, पात्र आदि रखे जाते हैं परंतु ये साधना के मूल तत्व नहीं है। इनको नहीं रखने वाला भी सिद्वावस्था को प्राप्त कर सकता है, क्योंकि ये मूल साधन मोक्ष के नहीं है, सहायक हैं। सहायक साधनों का भी कुछ अपना मूल्य हो सकता है। जैसे विद्यालय में पढ़ने वाले विद्यार्थियों का एक विशेष परिधान होता है पर वह शिक्षा का मूल तत्व नहीं होता, किंतु स्कूल की मर्यादा व्यवस्था है तो उसे नहीं पहनने वाला मर्यादा की अवहेलना करने वाला होता है। स्कूल की मर्यादा को पालना विद्यार्थियों के लिये आवश्यक होता है। इस प्रकार मूल मर्यादाओं के साथ सहायक मर्यादाओं का पालन भी आवश्यक होता है। किसी संगठन की भी अपनी मर्यादाएं होती है, जो सहायक के रूप में होती है। जिसकी जो भी मर्यादाएं हैं और कानून होते हैं, वे भी मर्यादाएं होती है।
मर्यादा के अंतर रहने से सुरक्षा और उनका अतिक्रमण करने से कठिनाई और खतरा भी हो सकता है। हमारे यहां मर्यादा महोत्सव मनाया जा रहा है, इस व्यवस्था का शुभारंभ तेरापंथ धर्मसंघ के चतुर्थ आचार्य श्री जयाचार्य ने किया था। लगभग 161 वर्ष बीत गए है और उनके समय शुरू हुआ क्रम आज भी चलता आ रहा है। वे मर्यादा महोत्सव के संस्थापक थे। मर्यादा महोत्सव का समय भी बहुत अनुकूल रखा गयाहै। माघ का महीना, जिसमें न अधिक सर्दी और न अधिक गर्मी रहती है। साधु-साध्वी भी अपने चातुर्मास की संपन्नता कर गुरू इंगित के अनुसार इसमें सम्मिलित हो सकते है। यह एक वार्षिक महोत्सव-सा हो जाता है। अतः आदमी को अपनी मर्यादाओं में रहना चाहिये जिससे वह बुरे कर्मों से बच सकता है, सत्कर्मों में प्रवृत हो सकता है। इसलिए मर्यादाओं के प्रति जागरूक रहने का प्रयास करना चाहिये।
मंगल प्रवचन के उपरांत आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में शासनश्री साध्वीश्री कानकुमारजी (चुरू) और शासनश्री साध्वी कनकश्रीजी (राजगढ़) की स्मृति सभा का आयोजन हुआ। आचार्य प्रवर ने दोनों साध्वियों का संक्षिप्त परिचय प्रदान किया और उनके आध्यात्मिक उर्ध्वारोहण के लिये मंगल कामना की। आचार्य प्रवर ने चतुर्विध धर्मसंघ को चार लोगस्स का ध्यान करवाया। साध्वीद्वय की आत्मा के प्रति मुख्य मुनिश्री महावीरकुमारजी, साध्वीप्रमुखाश्री विश्रुतविभा जी व साध्वीवर्या श्री संबुद्धयशाजी ने आध्यात्मिक मंगल कामना की। तदुपरांत साध्वी महकप्रभा जी, साध्वी सिद्धांतप्रभा जी, समणी ज्योतिप्रज्ञा जी, समणी कुसुमप्रज्ञा जी, साध्वी श्रेष्ठप्रभा जी, मुनि पारसकुमारजी, साध्वी सन्मति प्रभाजी ने अपनी श्रद्धा भिव्यक्ति दी। सुनाम पंजाब की ओर से साध्वी कनकश्री के संदर्भ में प्रस्तुत दी गई। डॉ. उषा जैन, नोखा तेरापंथी सभा के अध्यक्ष श्री शुभकरण चोरड़िया ने अपनी अभिव्यक्ति दी। तेरापंथ महिला मंडल नोखा ने गीत का संगान किया। लालचंद छाजेड़ ने अपनी अभिव्यक्ति दी। आचार्य प्रवर के स्वागत में साध्वी जगतयशाजी ने भावाभिव्यक्ति दी। ज्ञानशाला के प्रशिक्षक -प्रशिक्षिकाएं आदि ने सामूहिक गीत की प्रस्तुत दी।