स्वाध्याय
धर्म है उत्कृष्ट मंगल
गीत-सख्या तिथि
१,२ भाद्रव शुक्ला दशमी
३,४ भाद्रव शुक्ला एकादशी
५,६ भाद्रव शुक्ला द्वादशी
७,८ भाद्रव शुक्ला त्रयोदशी
९, १०, ११, १२, १३, १४ भाद्रव शुक्ला पूर्णिमा
१५, १६, १७, १८ आश्विन कृष्णा प्रथमा
१९, २० आश्विन कृष्णा तृतीया
२१, २२, २३, २४ आश्विन कृष्णा चतुर्थी
अन्तर्वस्तु
इस स्तुति-काव्य में तात्त्विक विश्लेषण एवं आध्यात्मिक सूत्र भी उपलब्ध हैं।
तात्विक विश्लेषण : गुणस्थान
प्रस्तुत काव्य की चौदहवीं गीतिका में गुणस्थानों के माध्यम से साधना की भूमिकाओं पर प्रकाश डाला गया है। तीर्थकर चौथे गुणस्थान से सीधे सातवें गुणस्थान की छलांग भरते हैं। आध्यात्मिक विकास के सार्वभौम नियम का उल्लेख करते हुए आचार्य कहते हैं- तीर्थंकर, बलदेव, वासुदेव, देव आदि पंचम गुणस्थान का स्पर्श नहीं करते - आदि-आदि गुणस्थान संबंधी तथ्यों की जानकारी से भरी हुई यह गीतिका मननीय है।
निक्षेपवाद
तेरहवीं गीतिका में आचार्यश्री ने निक्षेपवाद का स्पर्श किया है। भगवान विमल का स्तवन करते हुए वे कहते हैं- नाम, स्थापना और द्रव्य निक्षेप से विमल होने से आत्म-शुद्धि का उद्देश्य सिद्ध नहीं होता। उसके लिए 'भाव निक्षेप' से विमल होना आवश्यक है। द्रव्य तीर्थकर और भाव तीर्थकर की भेदरेखा खींचते हुए कृतिकार कहते हैं- 'गृहस्थ अवस्था और केवलज्ञान प्राप्ति से पूर्व अवस्था तक तीर्थकर द्रव्य तीर्थकर एवं कैवल्य-प्राप्ति के बाद वे भाव तीर्थकर बनते हैं।
भगवतू-स्तुति-फल
अष्टम गीत में भगवान को स्तुति का आनुषंगिक फल बताते हुए रचनाकार कहते हैं–
नरेन्द्र पद पामै सही, चरणसहित ध्यान तन मन्न हो।
अहमिन्द्र पद पामै बलि, कियां निश्चल थारो भजन्न हो ।।
प्रभु-भक्ति में निरत गृहस्थ 'नरेन्द्र' पद पा सकता है। किन्तु चारित्र (साधुत्व) का पालन करने वाला व्यक्ति ध्यान, भजन से अगले जन्म में नरेन्द्र नहीं बनता। वह अहमिन्द्र (उच्च कोटि का देव) पद को प्राप्त हो सकता है।
अनुकम्पा
सतरहवीं गीतिका में अनुकम्पा की संक्षिप्त एवं विशद व्याख्या की गई है – जिनेश्वर ने दो प्रकार की अनुकम्पा बतलाई है। सावद्य अनुकम्पा और निरवद्य अनुकम्पा। असंयमी प्राणी के जीने की कामना सावद्य अनुकम्पा (सांसारिक दया) है। सका आध्यात्मिक पथ-दर्शन करना आदि निरवद्य अनुकम्पा (पारमार्थिक दया) है।
प्रश्नोत्तर का विचित्र प्रकार
जैन सृष्टिवाद के अनुसार ऊर्ध्वलोक में स्थित अनुत्तर विमान के देव सर्वाधिक ऋद्धिसंपन्न होते हैं। अन्य देवों की भांति मनुष्यलोक में उनका यातायात नहीं होता। अपनी जिज्ञासा का समाधान पाने के लिए वे स्वस्थान से ही प्रश्न पूछते हैं और मर्त्यलोक में स्थित तीर्थकर उनका उत्तर देते हैं। तीर्थंकरों द्वारा प्रदत्त उत्तर को वे देव अवधि ज्ञान (अतीन्द्रिय ज्ञान) से जान लेते हैं। यह विचार-संप्रेषण या टेलीपेथी का उत्कृष्ट उदाहरण है।