स्वाध्याय
-आचार्यश्री महाप्रज्ञ
गौतम ने पूछा- 'भन्ते! जीव शाश्वत है या अशाश्वत?'
भगवान् ने कहा- 'गौतम! जीव शाश्वत भी है और अशाश्वत भी है।'
'भन्ते! दोनों कैसे ?'
'पर्याय की ऊर्मियों के तल में जो चेतना का स्थिर शान्त सागर है, वह शाश्वत है। उस सागर में ऊर्मियां उन्मज्जित और निमज्जित होती रहती हैं, वे अशाश्वत
हैं। ऊर्मियों का अस्तित्व सागर से भिन्न नहीं है और सागर का अस्तित्व ऊर्मियों से
भिन्न नहीं है। ऊर्मि-रहित सागर और सागर-रहित ऊर्मि का अस्तित्व उपलब्ध नहीं होता। इसीलिए मैं कहता हूं कि जीव शाश्वत भी है और अशाश्वत भी है। पर्यायों के तल में तिरोहित चेतना के अस्तित्व को देखें तब हम कह सकते हैं कि जीव शाश्वत है। चेतना के अस्तित्व पर उफनते पर्यायों को देखें तब हम कह सकते हैं कि जीव अशाश्वत है।
मूल तत्त्व जितने थे, उतने ही हैं और उतने ही होंगे। उनमें जो है, वह कभी नष्ट नहीं होता और जो नहीं है, वह कभी उत्पन्न नहीं होता। वे अवस्थित हैं, उत्पाद और विनाश के चक्र से मुक्त हैं। वे दो हैं-चेतन और अचेतन। वे दोनों स्वतन्त्र अस्तित्व हैं। इनमें अत्यन्ताभाव है। यहां अरस्तू का तर्क महावीर के नय से अभिन्न हो जाता है। अरस्तू का तर्क है कि 'अ' 'अ' है और 'अ' कभी 'क' नहीं हो सकता। 'क' 'क' है और 'क' कभी 'अ' नहीं हो सकता। महावीर का नय है कि चेतन चेतन है, चेतन कभी अचेतन नहीं हो सकता। अचेतन अचेतन है, अचेतन कभी चेतन नहीं हो सकता।
हम मूल तत्त्वों को पर्यायों के माध्यम से ही जान पाते हैं। पर्यायों का जगत बहुत बड़ा है। यह उत्पन्न होता है और विलीन होता है। पल-पल बदलता रहता है। यहां अरस्तू का तर्क महावीर के नय से भिन्न हो जाता है। पर्याय-जगत् के बारे में महावीर का नय है कि 'अ' 'अ' भी हैं और 'अ' 'क' भी है। 'क' 'क' भी है और 'क' 'अ' भी है। 'अ' 'क' हो सकता है और 'क' 'अ' हो सकता है।
भ्रमर काला है, पर वह काला ही नहीं है। वह पीला भी है, नीला भी है, लाल भी है और सफेद भी है।
चीनी मीठी है, पर वह मीठी ही नहीं है। वह कड़वी भी है, खट्टी भी है, कषैली भी है और तीखी भी है।
गुलाब का फूल सुगंधित है पर वह सुगंधित ही नहीं है। वह दुर्गन्धित भी है।
अग्नि उष्ण है, पर वह उष्ण ही नहीं है, वह शीत भी है।
हिम शीत है, पर वह शीत ही नहीं है, वह उष्ण भी है।
तेल चिकना है, पर वह चिकना ही नहीं है, वह रूखा भी है।
राख रूखी है, पर वह रूखी ही नहीं है, वह चिकनी भी है।
मक्खन मृदु है, पर वह मृदु ही नहीं है, वह कठोर भी है।
लोह कठोर है, पर वह कठोर ही नहीं है, वह मृदु भी है।
रूई हल्की है, पर वह हल्की ही नहीं है, वह भारी भी है।
पत्थर भारी है, पर वह भारी ही नहीं है, वह हल्का भी है।
व्यक्त पर्यायों को देखकर हम कहते हैं कि भ्रमर काला है, चीनी मीठी है, गुलाब का फूल सुगंधित है, अग्नि उष्ण है, हिम शीत है, तेल चिकना है, राख रूखी है, मक्खन मृदु है, लोह कठोर है, रूई हल्की है और पत्थर भारी है। यदि व्यक्त पर्याय अव्यक्त और अव्यक्त पर्याय व्यक्त हो जाए या किया जाए तो भ्रमर सफेद, चीनी कड़वी, गुलाब का फूल दुर्गन्धित, अग्नि शीत, हिम उष्ण, तेल रूखा, राख चिकनी, मक्खन कठोर, लोह मृदु, रूई भारी और पत्थर हल्का हो सकता है।