मर्यादा : गृहस्थ जीवन के लिए एक प्रेरणादायी आयाम

रचनाएं

श्रेयाँस कोठारी

मर्यादा : गृहस्थ जीवन के लिए एक प्रेरणादायी आयाम

मर्यादा महोत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि तेरापंथ धर्मसंघ की वह धड़कन है, जो हजारों साधु-साध्वियों और लाखौं गृहस्थों को एक सूत्र में बांधती है। यह केवल तिथि या परंपरा नहीं- यह संघ की आत्मा का उत्सव है। संघ की स्थापना से लेकर आज तक, प्रत्येक आचार्य ने मर्यादाओं को केवल शास्त्रों में नहीं रखा, बल्कि अपने जीवन में जिया है। इसी कारण तेरापंथ की मर्यादाएँ उपदेश नहीं, बल्कि प्रेरणा बनकर हर गृहस्थ के जीवन को दिशा देती हैं। तेरापंथ में मर्यादा केवल नियम नहीं- मर्यादा वह आभा है जो साधना को दिशा देती है और जीवन को शुद्धता का आलोक। मर्यादा महोत्सव हमें यह स्मरण कराता है कि जैसे साधु-साध्वी 'नियम में रमण करते हैं, वैसे ही गृहस्थ 'मर्यादा में जीवन' जीकर अपने घर को-एक छोटा आत्म-रमण तीर्थ, एक शांत साधना-कक्ष, एक अनुशासन-आश्रम बना सकता है। पिछले कई वर्षों से मर्यादा महोत्सव का साक्षी रहा हूँ। मैंने अनुभव किया है कि आचार्यश्री केवल साधु-साध्वी समाज को ही नहीं, गृहस्थों को भी बार-बार यह प्रेरणा देते हैं कि जीवन में अनुशासन और मर्यादा अनिवार्य है। एक बार एक युवक आचार्यश्री से मिलने पहुँचा। उसने पूछा- 'आज की भाग-दौड़ में मर्यादा कैसे निभे? व्यवसाय, रिश्ते, मोबाइल, तनाव-सब अपनी मर्यादा खो रहे हैं... क्या मर्यादा केवल साधु-साध्वियों के लिए है? आचार्यश्री मुस्कुराए और बोले- ‘मर्यादा दीवार नहीं जो बाँध दे, मर्यादा वह दिशा है जो जीवन को बचा ले। संघ-संयम साधु-साध्वी का मार्ग है, पर जीवन-संयम-गृहस्थ का सुहृद साथी।‘उसी क्षण लगा- मर्यादा ही गृहस्थ जीवन का असली रक्षक है। आज के समय में 'गृहस्थ मर्यादा'- कैसी? गृहस्थ जीवन जिम्मेदारियों का महासागर है। पर यदि उसमें मर्यादा की नाव हो, तो वही जीवन साधना-यात्रा बन जाता है। गृहस्थ मर्यादा का अर्थ है- बिना साधु बने, साधना की सुगंध को जीवन में उतार लेना। समय की मर्यादा समय का संतुलन ही गृहस्थ का दैनिक तप है। वाणी की मर्यादा मधुर वचन घर को स्वर्ग बनाते हैं, कटु वचन नरक। डिजिटल मर्यादा परिवार के समय मोबाइल से दूरी- आधुनिक संयम। आर्थिक मर्यादा कमाई में ईमान, खर्च में विवेक, दान में प्रसन्नता। भोजन व दिनचर्या की मर्यादा अति से बचना- स्वास्थ्य और शांति का आधार। व्यवहार की मर्यादा घर दीवारों से नहीं, स्वभावों से बनता है। गृहस्थ भी साधक है अक्सर गृहस्थ सोचता है- 'हम साधना कैसे करें?' पर साधना केवल ध्यान-कक्ष में नहीं होती। क्रोध रोक लेना भी साधना है सत्य बोलना भी साधना है। मुस्कान देना भी साधना है दिन के अंत में आत्म-परख करना भी साधना है। छोटी-छोटी मर्यादाएँ ही गृहस्थ की बड़ी तपस्या हैं। बाहर से गृहस्थ, भीतर से साधक - यही तेरापंथी पहचान है। तेरापंथी गृहस्थः केवल परिवार का नहीं, संघ का भी साधक तेरापंथ की मर्यादा केवल व्यक्तिगत नहीं- संघात्मक है। साधु-साध्वी संघ की रीढ़ हैं, तो गृहस्थ उसकी शक्ति और आधारशिला। यदि साधु त्याग से संघ को आगे बढ़ाते हैं, तो गृहस्थ सहयोग से उसे स्थिरता देते हैं। संघ और श्रावक-दो नहीं, एक ही साधना के दो आयाम हैं। गृहस्थ की आध्यात्मिक मर्यादाएँ प्रतिदिन स्वाध्याय या ध्यान गुरु-आज्ञा के प्रति श्रद्धा सामायिक, प्रतिक्रमण, जप पर्वों में संयम आत्मचिंतन और मौन यही गृहस्थ का आंतरिक तप है। संघ के प्रति जिम्मेदारियाँ एक तेरापंथी गृहस्थ की मर्यादा है कि- संघ-एकता को सर्वोपरि रखे। समय की पाबंदी, वचन-पालन, जिम्मेदारी, सेवा-भाव - यही छोटे अनुशासन मिलकर बड़े संघ का निर्माण करते हैं। मर्यादा महोत्सव यह पूछता है- क्या हमारा घर मर्यादित है? क्या हमारी वाणी संयमित है? क्या हमारा जीवन अनुशासित है? क्या हम संघ के प्रति उत्तरदायी हैं? यदि उत्तर 'हाँ' है- तो वही सच्चा मर्यादा महोत्सव है। अंत में पुनः यही कहना चाहूँगा- मर्यादा बंधन नहीं- रक्षा है। तभी तेरापंथ की परंपरा तेजस्वी बनती है। और सच तो यह है- गृहस्थ यदि मर्यादित हो जाए, तो उसका घर ही सबसे सुंदर तीर्थ बन सकता है।

मर्यादा महोत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि तेरापंथ धर्मसंघ की वह धड़कन है, जो हजारों साधु-साध्वियों और लाखौं गृहस्थों को एक सूत्र में बांधती है। यह केवल तिथि या परंपरा नहीं- यह संघ की आत्मा का उत्सव है। संघ की स्थापना से लेकर आज तक, प्रत्येक आचार्य ने मर्यादाओं को केवल शास्त्रों में नहीं रखा, बल्कि अपने जीवन में जिया है। इसी कारण तेरापंथ की मर्यादाएँ उपदेश नहीं, बल्कि प्रेरणा बनकर हर गृहस्थ के जीवन को दिशा देती हैं। तेरापंथ में मर्यादा केवल नियम नहीं- मर्यादा वह आभा है जो साधना को दिशा देती है और जीवन को शुद्धता का आलोक। मर्यादा महोत्सव हमें यह स्मरण कराता है कि जैसे साधु-साध्वी 'नियम में रमण करते हैं, वैसे ही गृहस्थ 'मर्यादा में जीवन' जीकर अपने घर को-एक छोटा आत्म-रमण तीर्थ, एक शांत साधना-कक्ष, एक अनुशासन-आश्रम बना सकता है। पिछले कई वर्षों से मर्यादा महोत्सव का साक्षी रहा हूँ। मैंने अनुभव किया है कि आचार्यश्री केवल साधु-साध्वी समाज को ही नहीं, गृहस्थों को भी बार-बार यह प्रेरणा देते हैं कि जीवन में अनुशासन और मर्यादा अनिवार्य है। एक बार एक युवक आचार्यश्री से मिलने पहुँचा। उसने पूछा- 'आज की भाग-दौड़ में मर्यादा कैसे निभे? व्यवसाय, रिश्ते, मोबाइल, तनाव-सब अपनी मर्यादा खो रहे हैं... क्या मर्यादा केवल साधु-साध्वियों के लिए है? आचार्यश्री मुस्कुराए और बोले- ‘मर्यादा दीवार नहीं जो बाँध दे, मर्यादा वह दिशा है जो जीवन को बचा ले। संघ-संयम साधु-साध्वी का मार्ग है, पर जीवन-संयम-गृहस्थ का सुहृद साथी।‘उसी क्षण लगा- मर्यादा ही गृहस्थ जीवन का असली रक्षक है। आज के समय में 'गृहस्थ मर्यादा'- कैसी? गृहस्थ जीवन जिम्मेदारियों का महासागर है। पर यदि उसमें मर्यादा की नाव हो, तो वही जीवन साधना-यात्रा बन जाता है। गृहस्थ मर्यादा का अर्थ है- बिना साधु बने, साधना की सुगंध को जीवन में उतार लेना। समय की मर्यादा समय का संतुलन ही गृहस्थ का दैनिक तप है। वाणी की मर्यादा मधुर वचन घर को स्वर्ग बनाते हैं, कटु वचन नरक। डिजिटल मर्यादा परिवार के समय मोबाइल से दूरी- आधुनिक संयम। आर्थिक मर्यादा कमाई में ईमान, खर्च में विवेक, दान में प्रसन्नता। भोजन व दिनचर्या की मर्यादा अति से बचना- स्वास्थ्य और शांति का आधार। व्यवहार की मर्यादा घर दीवारों से नहीं, स्वभावों से बनता है। गृहस्थ भी साधक है अक्सर गृहस्थ सोचता है- 'हम साधना कैसे करें?' पर साधना केवल ध्यान-कक्ष में नहीं होती। क्रोध रोक लेना भी साधना है सत्य बोलना भी साधना है। मुस्कान देना भी साधना है दिन के अंत में आत्म-परख करना भी साधना है। छोटी-छोटी मर्यादाएँ ही गृहस्थ की बड़ी तपस्या हैं। बाहर से गृहस्थ, भीतर से साधक - यही तेरापंथी पहचान है। तेरापंथी गृहस्थः केवल परिवार का नहीं, संघ का भी साधक तेरापंथ की मर्यादा केवल व्यक्तिगत नहीं- संघात्मक है। साधु-साध्वी संघ की रीढ़ हैं, तो गृहस्थ उसकी शक्ति और आधारशिला। यदि साधु त्याग से संघ को आगे बढ़ाते हैं, तो गृहस्थ सहयोग से उसे स्थिरता देते हैं। संघ और श्रावक-दो नहीं, एक ही साधना के दो आयाम हैं। गृहस्थ की आध्यात्मिक मर्यादाएँ प्रतिदिन स्वाध्याय या ध्यान गुरु-आज्ञा के प्रति श्रद्धा सामायिक, प्रतिक्रमण, जप पर्वों में संयम आत्मचिंतन और मौन यही गृहस्थ का आंतरिक तप है। संघ के प्रति जिम्मेदारियाँ एक तेरापंथी गृहस्थ की मर्यादा है कि- संघ-एकता को सर्वोपरि रखे। समय की पाबंदी, वचन-पालन, जिम्मेदारी, सेवा-भाव - यही छोटे अनुशासन मिलकर बड़े संघ का निर्माण करते हैं। मर्यादा महोत्सव यह पूछता है- क्या हमारा घर मर्यादित है? क्या हमारी वाणी संयमित है? क्या हमारा जीवन अनुशासित है? क्या हम संघ के प्रति उत्तरदायी हैं? यदि उत्तर 'हाँ' है- तो वही सच्चा मर्यादा महोत्सव है। अंत में पुनः यही कहना चाहूँगा- मर्यादा बंधन नहीं- रक्षा है। तभी तेरापंथ की परंपरा तेजस्वी बनती है। और सच तो यह है- गृहस्थ यदि मर्यादित हो जाए, तो उसका घर ही सबसे सुंदर तीर्थ बन सकता है।