गुरुवाणी/ केन्द्र
भिक्षु के दृष्टांतों से समझे दया : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अखंड परिव्राजक, योगक्षेम वर्ष प्रवेश के लिए लाडनूं की ओर गतिमान है। आज शनिवार प्रातः पूज्य प्रवर बिंचावा गांव से गतिमान हुए और लगभग 10 किमी का विहार कर कैराप गांव में स्थित राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में पधारे। विद्यालय परिसर में आयोजित मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अमृत देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि अहिंसा, संयम, और तप महान धर्म है। आचार्यश्री भिक्षु ने धर्म जो दया के रूप में है, उसका विश्लेषण किया है। पाप आचरण से आत्मा की रक्षा करना लोकोत्तर दया है, आध्यात्मिक दया है।
दया को समझाने की दृष्टि से तीन दृष्टांतों को काम में लिया जा सकता है। कैसे एक चोर साधुओं के पास चोरी करने का त्याग करता है और उसकी आत्मा चोरी के पाप से बच जाती है साथ में सेठ का धन भी बच जाता है। एक बकरे को मारने वाले कसाई को संतों ने उपदेश दिया, बकरों को मारने का त्याग कराया तो उसकी आत्मा का कल्याण हुआ, हिंसा परित्यक्त हुई और बकरों की जान भी बच गई। यहां दया की दृष्टि से ध्यान दें तो साधुओं ने जो प्रयास किया उससे चोरों की आत्मा सुधरी, कसाई ने बकरे मारने का त्याग किया ये दोनों लोकोत्तर दया हुई। साथ में सेठ का धन बचने और बकरों की जान बचने का कार्य भी हुआ है। साधुओं का उद्देश्य केवल आत्मा के कल्याण का था। मान लिया जाए कि चोरों ने चोरी का त्याग न किया होता और कसाई ने बकरों को मारने का त्याग न किया होता तो भी साधुओं को अपने प्रयास का लाभ मिलता ही मिलता, यहां कोई यह कहे कि सेठ का धन बचना और बकरों की जान बचना भी धर्म है तो इस संदर्भ में तीसरा दृष्टांत माननीय है।
एक परदार सेवन करने वाले व्यक्ति को साधुओं ने परदार सेवन करने का त्याग कराया, इससे उस व्यक्ति की आत्मा तो सुधरी, लेकिन जो महिला थी उसने उस व्यक्ति पर आसक्त होने के कारण अपनी जान दे दी। यदि सेठ के धन बचने और बकरे की जान बचने को धर्म मान लिया जाए तो फिर महिला की मृत्यु का पाप भी साधुओं को लगना चाहिए। ऐसे में चोर, कसाई और लंपट व्यक्ति की आत्मा का कल्याण ही साधुओं का मूल लक्ष्य था। साधुओं का मूल कार्य तो आत्म कल्याण का ही होता है। आचार्यश्री भिक्षु के दृष्टांतों के साथ किसी रूप में मुनिश्री हेमराजजी स्वामी भी जुड़े रहे। आज उनका दीक्षा दिवस है। वे तेरापंथ धर्म संघ के एक मात्र संत हैं जिन्हें आचार्य ने शासन महास्तंभ का अलंकरण प्रदान किया है। आज आचार्यश्री भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष के तृतीय चरण के तृतीय दिवस का कार्यक्रम सुसंपन्न हो रहा है।
आचार्यश्री ने चतुर्दशी के संदर्भ में हाजरी का वाचन किया और साधु-साध्वियों को प्रेरणा प्रदान की। तदुपरांत मुनि हेमऋषिजी, मुनि मर्यादाकुमारजी, मुनि आर्षकुमारजी, व मुनि मेघकुमारजी ने आचार्यश्री की आज्ञा से लेख पत्र का उच्चारण किया। पूज्य प्रवर ने मुनि हेमऋषिजी को इक्कीस कल्याणक और अन्य तीन मुनि वृंद को एक-एक कल्याणक बख्सीस किए। तदुपरांत उपस्थित चारित्रात्माओं ने अपने-अपने स्थान पर खड़े होकर लेखपत्र का उच्चारण किया। आचार्यश्री ने समुपस्थित ग्रामीणों को सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति की प्रेरणा दी और ग्रामीणों ने संकल्प स्वीकार किए। आदर्श कांन्वेन्ट स्कूल की ओर से गोविंद राखेचा, रूगाराम ढ़ाका ने आचार्यश्री के स्वागत में अपनी अभिव्यक्ति दी।