गुरुवाणी/ केन्द्र
संतों और ज्ञानियों से होता है धर्म का बोध प्राप्त : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, तीर्थंकर के प्रतिनिधि, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी छोटी खाटू की धरा पर 10 दिवसीय प्रवास के साथ ही तेरापंथ धर्मसंघ का 162वां मर्यादा महोत्सव सुसंपन्न कर आज प्रातः काल की मंगल बेला में गतिमान हुए। आचार्यश्री के विहार के समय ही भारत सरकार के केन्द्रीय कानून और न्याय मंत्री श्री अर्जुन राम मेघवाल भी आचार्यश्री के दर्शनार्थ पहुंचे। छोटी खाटू मर्यादा महोत्सव व्यवस्था समिति के अध्यक्ष श्री मनसुखलाल सेठिया के निवास स्थान में उनके साथ पूज्य प्रवर का वार्तालाप हुआ। आचार्य प्रवर ने मार्ग में अनेकानेक घरों के सामने रूक-रूक कर मंगल पाठ सुनाया। छोटी खाटू के बाहर विहार मार्ग में अनेक स्थानों पर विद्यार्थियों को सद्भावना, नैतिकता व नशा मुक्ति की प्रेरणा प्रदान की। मार्ग में ही शेराली आबाद के मुस्लिम समुदाय के लोगों ने आचार्यश्री का भावभीना स्वागत किया। पूज्य प्रवर ने मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। मार्ग में अनेक गौशालाओं आदि में पधारते हुए लगभग 10 किमी का विहार सुसंपन्न कर आचार्यश्री बिंचावा गांव स्थित राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में पधारे।
विद्यालय परिसर में आयोजित मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि आदमी सुनकर कल्याण को, धर्म को भी जान लेता है तथा सुनकर पाप को जान लेता है। कल्याण और पाप दोनों को आदमी सुनकर जानता है और फिर जो श्रेयस्कर हो उसका अनुसरण करना चाहिए। आदमी संतों और ज्ञानियों से सुनता है तो धर्म का बोध प्राप्त होता है। अहिंसा, ईमानदारी आदि की प्ररेणा मिल सकती है। हमारे धर्मसंघ के प्रथम आचार्य आचार्यश्री भिक्षु स्वामी हुए। उन्होंने अहिंसा और दया की बात बताई। आदमी के भीतर क्रोध, मान, माया, लोभ कषाय होते हैं। उससे आदमी कषायी बन जाता है और इनका त्याग कर अकषायी भी बन सकता है। आचार्य प्रवर ने कसाई का दृष्टांत सुनाते हुए कहा कि संतो के उपदेश से कसाई ने पाप को समझकर आजीवन हिंसा का त्याग किया। अतः सामने वाले को समझाने की भी कला हो कि बात सामने वाले के गले उतर जाए। कसाई ने मुनिजी की बात को सुना, हृदयंगम भी किया और स्वीकार भी कर लिया और बकरों को मारने का त्याग कर लिया। इस घटना से दो कार्य हुए पहला कसाई की आत्मा, हिंसा का त्याग कर देने के कारण पाप से बच गई, आत्मा की रक्षा हो गई। दूसरा काम हुआ बकरे मरने से बच गए, बकरों का शरीर बच गया। यहां मूल चीज साधुओं का आदेश था वह कसाई की आत्मा को पाप से बचाने के लिए था। यहां कसाई की आत्मा पाप से बची वह विशुद्ध धर्म हुआ, प्रासंगिक रूप में बकरों की जान भी बच गई।
यह सिद्धांत है कि निर्जरा के साथ पुण्य का बंध भी होता है। निर्जरा मूल कार्य है और प्रासंगिक रूप में पुण्य का बंध होता है। धर्म का मूल कार्य आत्मा को पाप से बचाना है, प्रासंगिक रूप में अन्य मौलिक लाभ भी हो सकते हैं। आचार्य भिक्षु के इस तत्त्व परक चिंतन में अहिंसा, त्याग और संयम है, इनका साधुओं द्वारा उपदेश देने से आदमी की आत्मा भी सुधर सकती है और प्रसंग रूप अन्य भौतिक परिणाम भी प्राप्त हो सकते है। पूज्यप्रवर ने आचार्यश्री भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष के तृतीय चरण के मध्य वर्ती दिन आचार्य भिक्षु के साहित्य का स्वाध्याय करने की प्रेरणा प्रदान की और अपने आराध्य का पावन स्मरण किया। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्य प्रवर ने ग्राम वासियों को सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति की प्रेरणा प्रदान की व संकल्पों का स्वीकरण भी करवाया। राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय के उप प्रधानाचार्य विकास सैनी व सरपंच महरचंद ने अपनी श्रद्धामिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने उन्हें मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।