गुरुवाणी/ केन्द्र
मन की पवित्रता–एकाग्रता होती है सुख प्रदान करने वाली : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखंड परिव्राजक, शांतिदूत, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने छोटी खाटू के मर्यादा समवसरण में समुपस्थित श्रद्धालुओं को अमृत देशना प्रदान करते हुए कहा कि आगम में मन को एक दुष्ट घोड़े की उपमा देते हुए कहा कि यह दुष्ट अश्व की तरह दौड़ता रहता है। कभी यह एकाग्र भी होता है, परन्तु इसकी चंचलता भी रहती है। आज दसवें अधिशास्ता आचार्यश्री महाप्रज्ञजी का दीक्षा दिवस है, माघ शुक्ला दसमी। आचार्यश्री महाप्रज्ञजी ने बालावस्था में ही साधुत्व स्वीकार कर लिया था। आचार्यश्री का आयुष्य लंबा था और अंतिम सांस तक उन्होंने संन्यास का पालन किया। उनका अखंड संयम जीवन रहा जो एक बड़ी उपलब्धि है। आचार्यश्री महाप्रज्ञ प्रेक्षाध्यान करवाते थे जिससे कि मन की चंचलता कम हो सके।
हमारे भीतर का भाव, कार्मण शरीर का प्रभाव हमारे मन को चंचल बनाने वाला होता है। भीतर की वृत्तियां-राग-द्वेष के प्रभाव से मन अधिक चंचल हो जाता है। जैसे-जैसे राग-द्वेष के भाव कमजोर पड़ते हैं और वीतरागता आ जाए, फिर मन की समस्या नहीं रहती है। मन अच्छा अश्व भी बन सकता है। मन पवित्र और एकाग्र भी रह सकता है। मन में अच्छे विचार, अच्छी स्मृतियां और कल्पनाएं भी हमारे भीतर आ सकती है। मन को पवित्र संकल्प और कल्याणकारी विचारों वाला बनाने का प्रयास करना चाहिए। मन यदि पवित्र विचारों वाला और एकाग्र बन जाए तो मन, सुमन बन सकता है।
मन की पवित्रता और एकाग्रता सुख प्रदान करने वाली होती है। श्रुत की लगाम से मनरूपी घोड़े को काबू में कर लिया जाए तो मन रूपी अश्व भी अच्छा बन सकता है। मन की चंचलता का संबंध कषाय से है। कषाय और योग ये दो चीजें ही मन को चंचल बनाने के लिए जिम्मेदार होती है। जब कषाय क्षीण हो जाते हैं तो बाद में कोरा योग रहता है जिससे ज्यादा बंध नहीं हो सकता। पूज्य गुरुदेव ने आचार्यश्री महाप्रज्ञजी के दीक्षा दिवस के संदर्भ में आगे कहा कि उन्होंने अनेक प्रेक्षाध्यान शिविरों का निर्देशन और सान्निध्य प्रदान किया। वि.सं. 2087 को उनके दीक्षा के सौ वर्ष पूरे हो जाएंगे। ध्यान की साधना भी मन को एकाग्र बनाने में सहयोगी बन सकती है।
अणुव्रत समिति छोटी खाटू के अध्यक्ष कपूरचंद बेताला ने अभिव्यक्ति दी और अणुव्रत के संकल्प पत्र आचार्य प्रवर के समक्ष प्रस्तुत किए। पूज्य प्रवर ने मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। टीकमचन्द सेठिया ने अपनी अभिव्यक्ति दी। साध्वी मधुस्मिता जी ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी और सहवर्ती साध्वियों के साथ गीत का संगान किया। तेरापंथी सभा विजयनगर बेंगलुरू के अध्यक्ष मंगलचंद कोचर ने गीत की प्रस्तुति दी। प्रतीक लोढ़ा ने गीत की प्रस्तुति दी और सरला धारीवाल ने भी अपनी भावाभिव्यक्ति दी।