विद्यार्थियों में अहिंसा, नैतिकता, ईमानदारी, नशा मुक्ति के संस्कार रहे  :आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

छोटी-खाटू। 27 जनवरी, 2026

विद्यार्थियों में अहिंसा, नैतिकता, ईमानदारी, नशा मुक्ति के संस्कार रहे :आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के देदीप्यमान नक्षत्र, वर्तमान अधिशास्ता, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी अभी छोटी खाटू की धरा पर पावन प्रवास कर रहे हैं। आज मर्यादा समवसरण में आयोजित मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की सन्निधि में भारत सरकार के शिक्षा मंत्री श्री धर्मेन्द्र प्रधान और राजस्थान के शिक्षा मंत्री श्री मदन दिलावर उपस्थित हुए। आचार्यश्री महाश्रमण मर्यादा महोत्सव व्यवस्था समिति के अध्यक्ष श्री मनसुखलाल सेठिया ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी।
महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने समुपस्थित जनता को अमृत देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि जैन आगम उतराध्ययन में शिक्षा प्राप्ति में पांच प्रकार की बाधाएं बताई गई है। जिनके कारण व्यक्ति शिक्षा ग्रहण नहीं कर सकता। इन पांच करणों में पहला कारण बताया गया है- अहंकार। अहंकार के कारण शिक्षा प्राप्ति में बाधा हो सकती है। यदि विद्यार्थी के मन में ज्ञान के प्रति सम्मान और विद्या के प्रति विनय है तो वह शिक्षा के क्षेत्र में अधिक आगे बढ़ सकेगा। इसके साथ ही ज्ञानदाता के प्रति भी सम्मान का भाव होना चाहिये। विद्यार्थी को कुछ ज्ञान प्राप्त हो जाए तो उस ज्ञान का भी घमंड नहीं करना चाहिये। अच्छा उपयोग करना चाहिये।
दूसरी बाधा- क्रोध। क्रोध के कारण मस्तिष्क में जो प्रतिक्रिया रहती है तो ज्ञान प्राप्त करने में कठिनाई पैदा हो जाती है। अतः विद्यार्थी को अधिक क्रोध से बचते हुए अपने स्वभाव को शांत रखने का प्रयास करना चाहिये। तीसरी बाधा- प्रमाद। विद्यार्थी पढ़ाई को गौण कर अन्य चीजों जैसे खाने में, मौज-मस्ती, सिनेमा, नींद आदि में रस लेने लग जाए तो भला वह कितना ज्ञान ग्रहण कर पाएगा। इसलिए विद्यार्थी को प्रमाद से बचना चाहिये। चौथी बाधा रोग- बीमारी। शरीर में रोग उत्पन्न होने पर भी ज्ञान प्राप्ति में बाधा आ सकती है। अतः अपनी ओर से खान-पान आदि में संयम रखना चाहिये। जिससे जितना संभव हो सके बीमारी से बचा जा सके। शरीर का रोग मुक्त होना ज्ञान प्राप्ति के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है। पांचवीं बाधा आलस्य का कहा गया है। इसलिए विद्यार्थी को आलस्य से बचना चाहिये। विद्यार्थी उद्यमी और परिश्रम शील हो तो शिक्षा की प्राप्ति कर सकता है। इन पांच बाधाओं से विद्यार्थी बच कर रहे तो वह ज्ञान के क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकता है। ज्ञान से प्रकाश मिलता है। अज्ञान अंधकार के समान है। ज्ञान होता है तो उसका सार होता है- आचार। ज्ञान के साथ-साथ आचार भी अच्छे बनने चाहिये। इसके लिये अच्छे संस्कारों का विकास भी बहुत आवश्यक होता है। विद्यार्थियों में शिक्षकों को शिक्षा के साथ-साथ अच्छे संस्कारों का विकास भी करना चाहिये।
बच्चों को अहिंसा, नैतिकता, ईमानदारी, नशा मुक्ति आदि के संस्कारों भी दिये जाते रहें। आचार्य प्रवर ने उपस्थित विद्यार्थियों को सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति की प्रेरणा प्रदान करते हुए इनकी प्रतिज्ञाएं भी करवाई। विद्यार्थियों ने सहर्ष प्रतिज्ञाएं स्वीकार की। मंगल प्रवचन में उपस्थित केन्द्रीय एवं राज्य शिक्षा मंत्रियों को संबोधित करते हुए पूज्य प्रवर ने कहा कि आज केन्द्रीय शिक्षा मंत्रीजी एवं राजस्थान राज्य मंत्रीजी का आगमन हुआ है। विद्यार्थियों में अच्छी शिक्षा एवं संस्कारों का अधिकाधिक विकास हो, ऐसा कार्य होता रहे। भारत जो धार्मिक-आध्यात्मिक देश है और यहां प्राचीन ग्रंथ विपुल मात्रा में उपलब्ध है। अच्छे ज्ञानवान विद्यार्थियों को तैयार कर देना बहुत अच्छी बात हो सकती है। राजनीति की सेवा का एक अच्छा माध्यम है। विद्यार्थियों में अच्छी शिक्षा व संस्कारों का विकास होता रहे।
पूज्य प्रवर के मंगल प्रवचन के उपरांत किसान उद्योग आयोग के अध्यक्ष श्री सी.आर. चौधरी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। राजस्थान के शिक्षा मंत्री श्री मदन दिलावर ने कहा कि मैं महान आचार्यश्री महाश्रमणजी के चरणों में वंदना करता हूं। हम सभी परम सौभाग्यशाली हैं कि अहिंसा, संयम और साधना के जीवंत प्रतीक आचार्यश्री महाश्रमणजी के दर्शन का अवसर मिल रहा है। हम सभी को आपसे मंगल प्रेरणा प्राप्त हो रही है। भारत सरकार के शिक्षा मंत्री श्री धर्मेन्द्र प्रधान ने अपने उद्बोधन में कहा कि परम श्रद्धेय आचार्यश्री महाश्रमणजी को सादर प्रणाम करता हूं। यहां आप जैसे संत के पदार्पण से छोटी खाटू की यह धरती तीर्थ स्थल बन रही है। मैं आपकी सन्निधि में एक विद्यार्थी बनकर उपस्थित हुआ हूं। मैंने आचार्यश्री के प्रवचनों के नोट्स बनाए हैं। आप की प्रेरणाएं सिर्फ विद्यार्थियों के लिए ही नहीं हम सबके लिए हैं। बुद्धि समाज हित में लगे। लाडनूं प्रवास के दौरान पुन: आपसे कुछ ग्रहण करने के लिए उपस्थित होंगे।