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पुण्यवान आत्मा : साध्वी कानकुमारी जी
आगम ग्रंथों में एक सूक्त आता है ‘पतेयं पुण्यपावं अर्थात पुण्य पाप अपने होते हैं। इस बात का अनुभव हम जीवन के हर क्षेत्र में कर सकते हैं। आपने भी कभी अनुभव किया होगा एक व्यक्ति बहुत त्याग बलिदान करके भी यश प्राप्त नहीं कर पाता और दूसरा जरा सा हाथ हिलाता है कि उसे पूरा कार्य करने का यश प्राप्त हो जाता है। कारण है अपने पूर्व संचित पुण्य।
ऐसी ही एक पुण्यवान आत्मा का जन्म चुरू के सुराणा परिवार में हुआ। गणाधिपति गुरूदेव तुलसी के हाथ जिन्होने संयम पथ स्वीकार किया और 34 वर्ष की निर्बाध संयमयात्रा का पालन कर जिन्होंने अपनी देह को छोड़ इस संसार को अलविदा कह दिया।
वे पुण्यवान थीं क्योकि-
lहर कोई उनके पास बैठना चाहता था
•lहर कोई उनकी बात मानता था।
•lवो जो चाहती वैसा प्राय: हो जाता।
•lगोचरी में भी कोई द्रव्य विशेष चाहिए होता तो बिना किसी विशेष प्रयत्न के वह प्राय: प्राप्त हो जाता था।
•lउनका कार्य करने को सब तत्पर रहते थे।
•lउनके संकल्प त्याग कभी टूटे नहीं।
•lवे कभी निराश हताश या तनावग्रस्त
नहीं हुई।
•lवे राजसी ठाट से दुनिया में आई, उसी ठाट से चली गई।
•lअनशन में लोगों का मेला लगा रहा।
•lतीसरा मनोरथ उन्होंने पूर्ण किया।
•lगुरूदेव ने जिनको भली साध्वी/अच्छी साध्वी अभिधा से अभिहित किया।
•lअन्त में चमकता दिव्य ललाट उनकी पूण्यवानी का प्रतीक है।
•lशान्ति से श्वास निकलना भी पुण्यवानी
ही है।
•lशारीरिक स्वास्थ प्राय: उनका अच्छा रहा- ये भी पुण्य प्रताप ही है।
उनकी पुण्यवता कैसे बढ़ी-
•वे कारण जिससे पुण्याई बढ़ाई जा सकती है जिससे इनकी पुण्याई बढी।
•lवे द्रव्यों का संयमित उपयोग करती- चाहे पानी हो चाहे कपड़ा चाहे किताब आदि।
•lवे अनासक्ति की साधिका थी- कोई उनसे किसी उनकी वस्तु की मांग करता, वह तत्काल दे देती।
lवे अपरिग्रह को जीती थी- परिग्रह के नाम पर उनके पास न कोई वस्तु थी, न व्यक्ति जिस पर उनकी मूच्र्छा हो।
•lवे अनाकर्षण में रहती- नई वस्तु प्राप्त होने पर भी वह 20-30-40 वर्ष पुरानी अपनी वस्तुओं का उपयोग करती थी।
•lवे ज्ञान ध्यान में मस्त रहती थी- अपने आप में रहना अपनी किताबों में जाप में ध्यान से
•lवे अलपभावी थी- ज्यादा बाते व्यर्थ की बाते उन्हें ज्यादा पसंद नहीं थी
•lवे सत्यवादी थी- असत्य संभाषण उन्हे पसंद नहीं थी जो है वह मुंह पर बोलने में सकुचाती नहीं थी।
•lवे अप्रमत्त थी- स्वयं भी प्रमाद नहीं करती, दूसरे करते तो कहती क्यूं खोटी हो वो जावो आपरो काम करो (अनशन के दिनों में भी)
•lदूसरों का हित चिन्तन करती थी- कैसे दूसरे का भला हो- उनका चिन्तन यही रहता था।
•lवे वात्सत्य व विनय की प्रतिभूति थी- छोटों को वात्सत्य देना तथा बड़ो के प्रति विनय भाव रखना दोनों गुण उनमें बराबर थे।
•lवो प्रमोद भावना बहुत भाती- कोई
छोटा सा कार्य भी कर दे तो उसके गुणगान करती रहती।
•lवे सकारात्मक दूष्टिकोण रखती- चाहे कैसी भी परिस्थित हो वो हमेशा अच्छे पहलू पर ही ध्यान दे ती पोजिटिव रहती।
•lवे संघ संघपति के प्रति पूर्ण समर्पित थी- संघ निष्ठा गुरू निष्ठा से वह खुद भी सराबोर थी, हमको भी निरन्तर प्रेरित कर संघ निष्ठा गुरू निष्ठा के संस्कार भरती थी।
•lवे आत्मनिष्ठ थी- सबसे ज्यादा वे आत्म की पवित्रता पर ध्यान देती। बात पर हमको कहती पाप से डरो, साधुपन इतना सस्ता नहीं है।
•lसंयम निष्ठा बेजोड़ थी- संयम में कोई दोष, कोई दाग उन्होंने जीवन भर नहीं लगाया।
•lवे आचारनिष्ठ थी- आचार में गडबड़ी उन्हे बिल्कुल मान्य नहीं थी। इसके लिए वह बहुत कड़ा अनुशासन भी करती थी।
•lसंकल्प शक्ति की धनी थी- जो संकल्प वे कर लेती फिर कोई भी उन्हें डिगा नही सकता था ।
मेरी दृष्टि में ये कुछ कारण हैं, जिनसे उनकी पुनवानी बढ़ी होगी, हालांकि उन्होंने इस दृष्टि से इनका उपयोग शायद ही किया हो क्योंकि वह आचार्य भिक्षु की इस वाणी को जीने वाली थी पुण्य की वांछा करना भी हेय है। फिर भी ये सभी कारण है जिसने उनको जनप्रिय और हर मन प्रिय बना दिया। ऐसी पुण्यवान आत्मा अपने चरम लक्ष्य को शीघ्रतिशीघ्र प्राप्त करें ऐसी मंगल कामना व कोटिश: नमन।