रचनाएं
अनासक्ति और अप्रमत्ता विरक्ति का प्रतिरूप साध्वी कानकुमारी जी
शासनश्री साध्वी कानकुमारी जी (चुरू) का साथ लगभग 62 वर्षों तक रहा। उन्होने मुझे जितना वात्सल्य और सन्मान दिया, वह अनिर्वचनीय है। परम पूज्य आचार्य श्री महाश्रमणजी के शासनकाल में कई कीर्तिमान बने है उसमें एक कड़ी और साध्वी कानकुमारी जी का संथारा होगा। उन्होंने जिस बढ़ती भावों की श्रेणी से उपवास पचखा था, वही भावों की श्रेणी उनकी अन्तिम समय तक रही। उनकी विरक्ति के कुछ बोलते प्रसंग हैं-
lउन्होंने किसी भी मौसम में कभी शरीर पर कोई प्रसाधन का प्रयोग नहीं किया, तेल, ग्लिसरीन भी नहीं।
lपहली गोचरी में जो आया, बस वही पर्याप्त था। बार बार कुछ नही मंगवाती न प्रतीक्षा करती थी।
l98 की उम्र तक उन्होंने न कभी शरीर दबवाया, न मालिश करवाई। अन्तिम दिनों तक पंचमी से आकर पैरों को पैरों को हिलाती थी। खुद योगासन करती थी।
lस्वावलम्बन पसंद था। इसलिए समताश्री जी से कहती, ज्यादा उम्र काम की नहीं है। स्वावलम्बन खत्म होने पर जीने का मजा नहीं रहता।
lजागरूक इतनी थी कि अन्तिम दिनों में अनशन की अवस्था में भी दोनों टाइम विधि पूर्वक प्रतिलेखन करती।
lअपना काम जो हो सके स्वयं करने का प्रयत्न करती, कोई जबरदस्ती दूसरा कर दे तो दूघ पीने का त्याग करती ऐसा संकल्प कर रखा था।
lरजोहरण से बरावर नहीं पूजना, खुले मुंह बोलना तथा तहत् नहीं बोलना ये सब उन्हें पसंद नहीं था।
lदूसरों की प्रमोद भावना तो उनमें उत्कृष्ट थी। सबको (कोई भी कार्य कर दें तो) कृपा कराई कहती ही रहती। मुझे भी कहती समय समय पर सत्यां रा गुण कर्या करो, अब ईयां ही तेयारा होसी।
lसिंघाड़े आने पर बहुत खुश होती। रूकने का आग्रह करती।
lवे अल्पाहारी, अल्पनिद्रा अल्पभावी अल्प परिग्रही एवं अल्पकवायी थी। परिग्रह रूप में अनेक पस मुठ्ठी भर सामान था- एक चलोका एक आगली एक छोटी डायरी और एक पेन।
lअमृत कलश (प्रथम प्रति) उसे ही जगह-जगह टेप लगाकर पढ़ती, दूसरी नहीं ली। नया कवर भी नहीं लगाती थी।
lतेरापंथ प्रबोध के पोथिये में दो पद्य कम थे। दूसरा नहीं लेकर उसी में अपने हाथ से लिख लिये।
•lसबसे बड़ी साधना काले कालं समायरे- इस हेतु पूर्ण सजग थी। अनशन की अवस्था में भी 3 बजे उठकर अपना जाप स्वाध्याय करती।
•lअनशन के समय भी मुझे बार-बार पूछती मेरी कोई गलती हो तो बताओ मुझे प्रायश्चित दे शुद्ध करवाओ।
•lइस तरह अनेक गुणोंका समवाय थी साध्वी श्री कानकुमारी जी।
lउनकी आत्मा उध्र्वारोहण करती हुई परम लक्ष्य को प्राप्त करें। मंगलकामना।