स्वाध्याय
धर्म है उत्कृष्ट मंगल
इक्कीसवीं गीतिका में यह तथ्य इस प्रकार पद्यबद्ध किया गया है-
सुर अनुत्तर विमाण नां सेवै रे, प्रश्न पूछ्यां उत्तर जिन देवै रे।
अवधिज्ञान करी जाण लेवै ।।
दुःख में सुख
नारकीय जीव दुःखबहुल जीवन जीते हैं। कुछ सुखद क्षण भी उन्हें नसीब होते हैं। तीर्थकरों के कल्याणक-गर्भाधान, जन्म, दीक्षा, कैवल्य प्राप्ति एवं निर्वाण के समय वे अनायास सुखानुभूति करते हैं। बाईसवें गीत का निम्नांकित पद्य इसी तथ्य को प्रकट करता है–
नेरिया पिण पामै मन मोद, तुझ कल्याण सुर करत विनोद।।
दुःख का मूल
पांचवीं गीतिका में काव्यकार कहते हैं- दुर्गति का मूल कषाय- क्रोध, मान, माया और लोभ है। ऐन्द्रियिक विषयों के प्रति होने वाली मूर्च्छा मोक्ष-सुख या इन्द्रियातीत सुखानुभूति का बाधक तत्त्व है।
दुर्गति-मूल कषाय, शिव-सुख नां अरि शब्दादिक कह्या।।
प्रभु बनने का उपाय
आठवीं गीतिका में भगवत्-प्राप्ति का मार्ग बतलाया गया है। परम संतोष की प्राप्ति अपने आपको पाने का रास्ता है। वीतराग का ध्यान करने से वीतरागता प्राप्त हो सकती है।
अहो! वीतराग प्रभु तूं सही, तुम ध्यान ध्यावै चित रोक हो।
प्रभुः तुम तुल्य ते हुवै ध्यान स्यूं, मन पायां परम सन्तोष हो।।
मोक्ष-साघन
ग्यारहवीं गीतिका में मोक्ष के साधक तत्त्वों की चर्चा की गई है। संयम, तप, जप, शील, अनित्य अनुप्रेक्षा, अशरण अनुप्रेक्षा और अनन्त या अन्यत्व अनुप्रेक्षा इनकी आराधना से शिव-प्राप्ति होती है।
क्षमा
साधना का एक सूत्र है क्षमा। करुणा-भाव का अभ्यास उसका सहायक तत्त्व है। करुणाशील व्यक्ति क्रोध से छुटकारा पा लेता है। बारहवीं गीतिका में इसी भावना का सूक्त प्राप्त है- करुणागर कदेइ नहीं कोपै।
समता
समया धम्ममुदाहरे मुणी - भगवान महावीर ने समता को धर्म कहा है। भगवान महावीर की स्तुति में निर्मित चौबीसवीं गीतिका में जयाचार्य कहते हैं-मान, अपमान, निन्दा, प्रशंसा, हर्ष-शोक आदि द्वन्द्वात्मक स्थितियों में समत्व की साधना करने वाला व्यक्ति परम शान्ति और निर्वाण को प्राप्त हो सकता है।
आत्म-कर्तृत्व
जैनधर्म का मत है-सुख-दुःख का कर्ता आत्मा स्वयं है। अपनी आत्मा ही मित्र और वही शत्रु है। दूसरा कोई हमारा मित्र या शत्रु नहीं है। इस सिद्धान्त को अन्तश्चेतना से स्वीकारने वाला व्यक्ति राग-द्वेष और पारस्परिक वैमनस्य से बच सकता है। जैन आगम कहते हैं– अप्पा मित्तममित्तं च दुप्पट्ठिय सुपट्ठिओ–सत्प्रवृत्ति में संलग्न आत्मा मित्र और दुष्प्रवृत्ति में निरत आत्मा शत्रु है। इन्हीं भावों को अभिव्यक्त करता है चौथी गीतिका का पद्यांश-
आतम मिंत्री हो सुखदाता सम परिणाम,
एहिज अमित्र असुभ भावे कलकली।
देहध्यान-मुक्ति
आत्मानुभूति के लिए देहध्यान को छोड़ना अथवा कायोत्सर्ग आवश्यक है। महावीर ने प्रव्रज्या के समय संकल्प किया-वोसटूटचत्तदेहे विहरिस्सामि मैं साधनाकाल में शरीर का व्युत्सर्ग और त्याग कर विहार करूंगा। विशिष्ट साधना करने के लिए शरीर की साज-सज्जा और सार-संभाल का परिहार अपरिहार्य होता है। प्रथम गीतिका में आचार्य कहते हैं- इम तन सार तजी करी, प्रभु केवल पाया।