स्वाध्याय
संबोधि
शंकर ने कहा- 'रावण का जन्म हुआ है।' कुछ ही क्षणों बाद फिर वैसी ही आवाज हुई और नन्दी ने फिर प्रश्न किया। शिवजी बोले-रावण की मृत्यु हो गई। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ, पूछा, यह कैसे ? अभी जन्मा और अभी मृत्यु ! शंकर ने कहा-जगत का यही स्वरूप है। जगत उत्पत्ति और विनाश से संयुक्त है।
शरीर में अनेक व्याधियां उत्पन्न होती हैं। शरीर व्याधि-आधि का मन्दिर है। उसे और क्या क्लेश दिया जाए ? इससे बढ़कर और कष्ट हो भी क्या सकता है? किन्तु जो इसे नहीं जानते, देखते, उन्हें दूसरी क्रियाएं कष्टप्रद प्रतीत होती हैं। साधक शरीर को कष्ट नहीं देता, किन्तु शरीर को साधना के अनुकूल बनाता है। शरीर को साधना का अभ्यास नहीं है। उसने जो कुछ देखा है, अनुभव किया है, वह अनुकूल का किया है। प्रतिकूल स्थिति उसे स्वयं कष्टपूर्ण लगती है। कुछ व्यक्ति विवश होकर महीनों तक एक जैसी स्थिति में पड़े रह सकते हैं। वे बहुत दुःख पाते हैं। किन्तु विवशता है। साधना की स्थिति में साधक स्व-वशता पूर्वक वैसा अभ्यास करता है, जिससे संसार की चंचलता समाप्त हो और आत्म-दिशा में आगे बढ़ा जा सके। काय की अस्थिरता मन को अस्थिर बना देती है। मन के चंचल होते ही धारणा, ध्यान विक्षिप्त हो जाता है। इस दृष्टि से आसन-विजय या काय-क्लेश का स्थान महत्त्वपूर्ण है। गौतम ने भगवान् महावीर से पूछा-भंते ! काय-क्लेश का प्रतिपादन क्यों किया ? भगवान् महावीर ने उत्तर दिया- 'गौतम ! सुख-सुविधा की चाह आसक्ति लाती है। आसक्ति से चैतन्य मूर्च्छित हो जाता है। मूर्च्छा धृष्टता लाती है। धृष्ट व्यक्ति विजय का पथ नहीं पा सकता। इसलिए मैंने यथाशक्ति काय-क्लेश का विधान किया है।
गौतम ने पूछा- 'भगवन् ! काय-क्लेश क्या है?' भगवान् ने कहा-'गौतम ! कायोत्सर्ग करना, आसन करना, आतापना लेना, निर्वस्त्र रहना, शरीर का परिकर्म नहीं करना, यह सब काय-क्लेश है।'
शरीर की आदत न होने के कारण यह सब उसे कष्टपूर्ण प्रतीत होता है। इसलिए इसे काय-क्लेश कहा है। ध्यान की स्थिति में सबसे बड़ी बाधा शरीर की होती है। थोड़ी सी देर स्थिर बैठना संभव नहीं है। कभी पैरों में दर्द, सनसनाहट, खुजली आदि विविध प्रकार की सूचनाएं प्राप्त होने लगती हैं। ध्यान निर्विघ्न नहीं होता। शरीर को अभ्यास है विषयों का। ध्यान निर्विषय है, एकाग्रता है। जैसे ही वह एकाग्र होता है शरीर सहन नहीं कर सकता। शरीर का स्वामित्व मन और आत्मा पर सर्वदा चलता रहा। जब उस पर शासन की स्थिति पैदा होती है तब वह बगावत करना शुरू कर देता है। काय-क्लेश का मूल सूत्र है-देह पर स्वामित्व की स्थापना करना, देह की चुनौती झेलने की क्षमता पैदा करना, स्वयं का मालिक स्वयं होना, इन्द्रिय, मन और शरीर के शासन से मुक्ति पाना। साधना का यही सार है।