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अनुशासन का पर्व है मर्यादा महोत्सव
आचार्य श्री महाश्रमणजी की सुशिष्या साध्वी सोमयशाजी ठाणा-3 के सान्निध्य में आरकोणम तेरापंथ भवन में 162वॉ मर्यादा महोत्सव का आयोजन हुआ। सेवा कैसे करनी चाहिए। सेवा से हमे क्या प्राप्त होता है। उससे संबंधित अनेक बातें बताई, अनेक प्रयोगों के माध्यम से सेवा का महत्त्व बताया। सेवा करने वाला स्वयं का और दूसरे का परम उपकार करता है। अपनी आत्मा को उज्जवल बनाता है। तेरापंथ धर्मसंघ की सेवा हम सबके लिए अनुकरणीय है। छठ के दिन अनुशासन संबंधी विशेष प्रवचन देते हुए कहा तेरापंथ धर्मसंघ अनुशासन की दृष्टि से उच्चता को प्राप्त है। यदि हम इसकी मीमांसा में जाए तो हमें तीन बातें विशेष रूप से नजर आएंगी, तीसरा दिन मर्यादा का उत्सव आचार्य भिक्षु ने इसकी नींव में मर्यादा का ऐसा शिला खण्ड रखा जो इस महल को निरंतर सुदृढ़ आधार प्रदान कर रहा है, भिक्षु के बाद जयाचार्य जी ने उनके अनुभवों का लाभ उठाते हुए तेरापंथ को एक नया अवदान प्रदान किया जिसकी पहचान 'मर्यादा महोत्सव' के रूप में विश्वव्यापी बनी। साध्वी डॉ. सरलयशाजी 'सेवा संस्कार दिवस' पर विचारों की अभिव्यक्ति दी। स्वागत भाषण अध्यक्ष अरिहंत डरला ने किया। आभार गजराज बरडिया ने किया।