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ओ संघ के सिपाही! जब तुममें भी दम होगा
ओ संघ के सिपाही! जब तुममें भी दम होगा।
तब ही तो अपना शासन प्रवर्धमान होगा।।
जिन शासन में भैक्षव शासन लगता सबसे प्यारा है।
ग्यारह आचार्यों की मेहनत का यह सुखद नजारा है।
शासन पावन निर्झर झरता, तन मन जीवन उज्ज्वल करता।
शासन नंदनवन है, प्राणों से प्यारा।
वर्धमान होता जाएं, हम सबके द्वारा ।।
एकनिष्ठ बन रहने वाले शासन भक्त महान है।।
एक-एक मोती से बनती मुक्ताओं की माला है।
एक-एक ही बूंद बनाती अतिविस्तृत जलशाला है।
हर एक सैनिक बड़ा उपयोगी,
अपनी अपनी योग्यता है अपना अपना योगी
महाउपकारी गुरुवर हम सबको तारें
उनकी कृपा से अपना रूप निखारे
इससे बढ़कर बतलाओ क्या गुरु-दाक्षिण्य प्रदान रे।।
हर मीटिंग में आगे सीटिंग अगवाणी की होती है।
नहीं किसी से न्यून कभी सहवर्ती महंगे मोती है।
इसीलिए तो यदा-कदा भी मांगे इनकी होती है।
घर को रोशन करने वाली यह जग मगती ज्योती है।
बच्चा हो बूढ़ा या फिर कोई रोगी, कला हो तुम्हारी तो बने उपयोगी।
अग्रणी जो वीर योद्धा, सहवर्ती सारथी।
अग्रणी है पूजा तो, सहवर्ती आरती।
वही अग्रणी अमर रहे, पीढी जिसकी तैयार है।।
तीर्थंकर प्रतिनिधि बन कर गुरु धर्मध्वज फहराते है।
धन्य-धन्य है अग्रगण्य वे गुरु प्रतिनिधि कहलाते है।
भाग्य विधाता गुरुवर जिनका संरक्षण दिरवाते है।
गुरु करुणा से रात दिवस वे पथदर्शन करवाते है।
सफल सहवर्ती है जो बने उनकी छाया, दृष्टा भी देख बोले अद्भुत माया
जिसने भी अपना सुंदर घर है जमाया, आगे चलकर के वो ही कुछ बन पाया।
हेम ऋषी के पास निखरते जयाचार्य भगवान है।।
श्रावक वर्धमान हो पाए, सीखे तत्वज्ञान को।
हेत परस्पर रखें सदा ही, साधे गहरे ध्यान को।
गुरुवर की आज्ञा को शीष चढ़ाई, इंगित पाकर अपने चरण बढ़ाएं
भक्त तुम्हारे भगवन! करते हैं अर्जी, कब, क्या करवाना भंते! यह तेरी मर्जी।
बोरावड़ की जनता मांगे, महा मोच्छव उपहार है।।
(लय- मिनखां थे जागो रे...)