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162वें मर्यादा महोत्सव पर विविध आयोजन
युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के सुशिष्या शासनश्री साध्वी बसंतप्रभा जी, साध्वी रचनाश्री जी और समाधि केन्द्र व्यवस्थापिका साध्वी मंजुयशा जी के सान्न्ध्यि में मर्यादा महोत्सव का भव्य आयोजन किया गया। शासनश्री साध्वी बसंतप्रभा जी ने अपने मंगल उद्बोधन में कहा तेरापंथ धर्मसंघ में गुरू आज्ञा को सर्वोपरि स्थान दिया गया है। गुरू आज्ञा के बिना इस संघ में कोई कार्य नही होता। अगर कोई आज्ञा के बिना कार्य करता है तो उसे उसका परिणाम भी भोगना पड़ता है। डालगणि के समय का प्रसंग जब आचार्य प्रवर ढीढवाणा बिराजे थे। 21 किलोमीटर दूर लाडनूं सेवा केन्द्र से कुछ साध्वियां गुरूदेव के दर्शनाथ, एक ही दिन में विहार कर ढीढवाणा गाँव बाहर पहुंची ही थी। डालगणि को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने उन साध्वियों से कहा कि तुम लोग बिना आज्ञा के ही इधर आ गई हो इसलिए वहीं से पुन: लाडनूं चली जाओ। साध्वियां बिना गुरू दर्शन किए ही वापस लौट गई। साध्वी रचनाश्री जी ने कहा कि तेरापंथ धर्मसंघ एक तेजस्वी धर्मसंघ है। गण में रहने वाला विकास को प्राप्त होता हैं। जो गण को छोड़ देता है वह अपना सौभाग्य हाथ से खो देता है।
शिष्य उदायण ने अपने गुरू से प्रश्न करता है गुरूदेव तेजस्वी,, बुद्धिमान कौन होता है। गुरू में अपने समक्ष रखे हुए अंगेठी में से एक अंगारे को चिमटे से बाहर निकाल कर रख दिया। कुछ ही क्षणों में वह अंगारा निस्तेज हो गया। कारण पूछने पर शिष्य ने बताया कि यह अंगारा अंगेठी से अलग हो जाने से निस्तेज हो गया। फिर गुरू ने बताया कि ठीक इसी प्रकार जो शिष्य गण में रहता है वह तेजस्वी, यशस्वी, बुद्धिमान और सौभाग्य सम्पन्न होता है। गण से बाहर निकलते ही वह निस्तेज हो जाता है इसलिए गण का महत्व है। उसमें भी तेरापंथ धर्मसंघ एक विशिष्ट धर्मसंघ है जो प्रत्येक साधक को मर्यादाओं का आलम्बन देता है। वह उसके साध्य की सिद्धि में सहयोग करता है। केन्द्र व्यवस्थापिका साध्वी मंजुयशाजी ने कहा कि तेरापंथ धर्मसंध एक मर्यादित और शक्तिशाली धर्मसंघ है। शक्ति के 5 मूल तत्व हैं। पहला अनुशासन बल जो संघ को शक्तिशाली बनाता है। दूसरा है सिद्धान्त बल। आचार्यश्री भिक्षु ने सिद्धान्त पर बहुत बल देकर इस संघ की नींव को मजबूत कर दिया। तीसरा तत्व है। मनोबल। आचार्य भिक्षु के जीवन में अनेक विरोधी तूफान आए पर उनका मनेाबल इतना मजबूत था कि इन सब की परवाह न करते हुए अपने आत्मपथ पर बढ़ते गए। चौथा तत्व अध्यात्म बल। जिन्हे अध्यात्म बल प्राप्त नही होता वह कभी भी बड़ा नहीं बन सकता। पाँचवां तत्व है समाधान बल। अगर आचार्यश्री भिक्षु के पास यह बल नही होता तो उनकी वाणी को कोई नही सुनता। उन्होंने समय की नब्ज को पहचाना और इन 5 तत्वों से इस शक्तिशाली संगठन का निर्माण हो गया। जो प्रतिदिन विकास की ऊचाईयों को प्राप्त कर रहा है। शासनश्री साध्वी साधनाश्री जी ने सुमधुर गीत का संगान किया। साध्वी रमावती जी, साध्वी संकल्पश्री जी, साध्वी रोहितयशा जी ने गीत और विचारो के माध्यम से अपनी प्रस्तुति दी। साध्वी रोहितयशा जी ने गीत और विचारों के माध्यम से अपनी प्रस्तुति दी। साध्वी जयंतयशा जी, साध्वी इन्दूप्रभा जी, साध्वी ऋजुप्रभाजी, साध्वी वीरप्रभाजी, साध्वी गीतार्थप्रभा जी, साध्वी नमनप्रभाजी, साध्वी मानसप्रभाजी और साध्वी स्तुतीप्रभा जी ने आधुनिकता के साथ तेरापंथ के अनुशासन, व्यवस्था और मर्यादाओं को उद्घाटित करने वाले रोचक कार्यक्रम की प्रस्तुति दी। तेरापंथ सभा के अध्यक्ष समपतमल बैद, मंत्री हनुमानमल सेठिया ने अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम का कुशल संचालन साध्वी चिन्मयप्रभा जी ने किया।