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तप आत्मशोधन का मार्ग–अक्षय तृतीया पर्व
अक्षय तृतीया तप की प्रेरणा का दिन है। इसके साथ आद्य तीर्थकर भगवान ऋषभ का संबंध जुड़ा हुआ है। भगवान ने दीक्षा ली और भिक्षाटन प्रारंभ किया। यह क्रम एक वर्ष साधिक चलता रहा। न भोजन और न पानी। अन्तराय कर्म का प्रबल योग था। जनता में भावना थी किन्तु भिक्षा विधि का बोध नहीं था। आखिर प्रपौत्र श्रेयांस कुमार ने जाति स्मरण ज्ञान से भगवान के भ्रमण का रहस्य जाना। उसके द्वारा प्रदत्त प्रासुक एषणीय इक्षु रस से भगवान के सहज तप का पारण हुआ। वह वैशाख शुक्ला तृतीया का दिन अक्षय तृतीया के रूप में प्रसिद्ध हो गया।
भगवान का तप और पारण दोनों ही आकर्षण के केन्द्र बन गये। भगवान जितना बल कहाँ से आये ? न वैसा संहनन और न वैसा सामर्थ्य। फिर भी महापुरुषों के अनुसरण की मनोवृत्ति ने एक नया रास्ता ढूंढ लिया। एक दिन भोजन और एक दिन उपवास का प्रकल्प निश्चित हो गया। इसे वर्षीतप कहा गया। हजारों तपः पूत व्यक्ति इस पथ पर चल पड़े। तप का एक नया मार्ग बन गया। महाजनो येन गतः स पंथाः के प्रतीक बने तपस्वी भाई-बहिन वर्षीतप का आलम्बन लेकर आत्म शोधन के मार्ग में चल रहे हैं। यह आध्यात्मिक अनुष्ठान चिरकाल से चल रहा है और भविष्य में भी चलता रहेगा।
तप उत्तम कार्य है। यह तीर्थकरों द्वारा प्ररूपित और प्रशंसित है। मोक्ष मार्ग चतुष्टयी संपन्न है जिसमें ज्ञान, दर्शन, चारित्र एवं तप तथा दान, शील, तप एवं भावना का समावेश किया गया है। दोनों प्रकार के मार्ग तप से विभूषित हैं। इससे तप की विशेष महत्ता का बोध होता है। जैनागम में तप के दो प्रकार बतलाये गये हैं-बाह्य और आभ्यन्तर। इन दोनों के छः-छः प्रकार बतलाये हैं। ये सब कर्म निर्जरण के साधन हैं। इनके अनुशीलन से देहाध्यास छूटता है और आत्मा पवित्र होती है। बारह प्रकार के तप अनुष्ठान से आत्मोदय होता है। इनकी साधना नितान्त फलदायी है। जैसे-
अनशन और अवमौदर्य से भूख और प्यास पर विजय पाने की ओर गति होती है। धृति और मनोबल का विकास होता है।
●भिक्षाचर्या और रस परित्याग से आहार की लालसा सीमित होती है तथा जिह्वा की लोलुपता मिटती है।
कायक्लेश से सहिष्णुता का विकास होता है, देह में उत्पन्न दुःखों को सहने की मनोवृत्ति बनती है।
प्रतिसंलीनता से आत्मा की सन्निधि में रहने का अभ्यास बढ़ता है।
●प्रायश्चित्त से अतिचार भीरूता और साधना के प्रति जागरूकता विकसित होती है।
विनय से अभिमान मुक्ति और परस्परोपग्रह का विकास होता है।
●वैयावृत्त्य से सेवाभाव और सौहार्द पनपता है।
स्वाध्याय से विकथा त्यक्त हो जाती है तथा एकाग्रता बढती है।
ध्यान से एकाग्रता, एकाग्रता से मानसिक विकास एवं मन तथा इन्द्रियों पर नियंत्रण पाने की क्षमता बढती है। संवेगों के नियमन का अभ्यास होता है।
व्युत्सर्ग से शरीर, उपकरण आदि पर होने वाले ममत्व का विसर्जन होता है।
भगवान ने तप प्रयोग के लिये विशेष दिशा-दर्शन देते हुये कहा- इहलोक के निमित्त तप मत करो। परलोक के लिये तप मत करो। श्लाघा-प्रशंसा के लिये तप मत करो। केवल निर्जरा के लिये- आत्म-विशुद्धि के लिये तप करो। भगवान की दृष्टि में वही तप श्रेष्ठ है जो एक मात्र मोक्ष साधना की दृष्टि से किया जाता है। इसे सकाम तप माना गया है। महत्ता, गुणवत्ता और फलवत्ता की दृष्टि से सकाम तप ही उत्तम है एवं इसी का अनुशीलन करना चाहिये। भगवान ऋषभ तप के आदि पुरुष थे और वर्तमान में प्रचलित वर्षीतप की परंपरा उन्हीं के तप का अनुसरण कर रही है। भगवान के तप को पकड़ा गया है किन्तु आभ्यन्तर तप को उतनी गहराई से नहीं पकड़ा गया है। जितना बाह्य तप जरूरी है, उतना ही आन्तरिक तप जरूरी है। उपवास बाह्य तप है तथा शान्ति-मुक्ति, स्वाध्याय-ध्यान आन्तरिक तप है। केवल बाह्य तप का अनुशीलन वैसा ही है जैसा रोटी को छोड़कर मात्र शाक को खा लेना। भोजन की पूर्णता के लिये जैसे रोटी और सब्जी दोनों आवश्यक है वैसे ही तप की पूर्णता के लिये बाह्य और आभ्यन्तर दोनों ही तप आवश्यक है। तप को परिभाषित करते हुये आचार्य श्री महाप्रज्ञजी ने लिखा है- "केवल आहार का वर्जन द्रव्य उपवास है और उसके साथ कषाय, कलह आदि का वर्जन तथा स्वाध्याय, ध्यान आदि का प्रयोग भाव उपवास है।" तप की परिपूर्णता की प्रेरणा देते हुये आचार्य श्री महाप्रज्ञजी कहते हैं-"धार्मिक व्यक्ति उपवास करता है और वह दिन भर सांसारिक क्रियाकलपों में उपवास के दिन को व्यतीत करता है तो वह उसका उपवास नहीं लंघन कहा जायेगा। उपवास करने वाला कम से कम तीन घंटा तो ध्यान, स्वाध्याय जप आदि में लगाये। होना तो यह चाहिये कि तपस्या का आधा समय इनमें लगे तब ही तपस्या की सार्थकता हो सकती है। तप का फलित होना चाहिये-कषाय शमन। इससे स्व और पर दोनों के लिये सुख की सृष्टि होती है तथा इहलोक और परलोक दोनों ही सुधरते हैं। तप आदि साधना का मूल उद्देश्य ही कषाय का शमन करना है। जहाँ यह नहीं होता वहाँ तप की शोभा पर ही प्रश्नचिह्न लग जाता है। श्रीमज्जयाचार्य ने उपशम सुख को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मानते हुए लिखा है- "जो सुख देव, देवेन्द्र, चक्रवर्ती, सम्राट् आदि को प्राप्त नहीं होता है वह सुख वीतराग-साधक को प्राप्त होता है।" यह सुख कषाय के शमन से प्राप्त होता है। प्राकृत साहित्य में कषाय शमन की विधि बतलाते हुये लिखा है- यदि कोई व्यक्ति आवेश और आक्रोश करे तो साधक यह सोचे कि यह गाली गलौच कर रहा है किंतु यह मुझे पीट तो नहीं रहा है। कदाचित् कोई व्यक्ति पीटने के लिये आ जाये तो यह सोचे कि यह मुझे पीट रहा है। किंतु प्राण-हरण तो नहीं कर रहा है। कदाचित् कोई व्यक्ति मारने के लिये ही आ जाये तो यह सोचकर मन को संतुष्ट करे कि यह मुझे जान से मार रहा है किंतु यह मुझे धर्मभ्रष्ट तो नहीं कर रहा है। इस प्रकार साधक उत्तरोत्तर उन्नत और विधायक चिन्तन करता हुआ अपनी आत्मा को उपशम सुख में लीन रखे। भगवान महावीर और आचार्य भिक्षु की क्षमा-साधना जबर्दस्त प्रेरणा है। हम भी उनके पद चिह्नों पर चलने का संकल्प करें।